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प्रसन्नता और सुख वाला र्धम

" मैं अपने आप से यह प्रष्न किया करता था की मुस्लमान अज्ञानी और गरीब होने के बावजूद क्यों उन्का जीवन प्रसन्नता से भरा हुवा है। आधुनिक विकास में सुख भरा जीवन बिताने के बावजूद भी क्यों स्वीडन के लोग मान्सिक कष्ट और तंगी से पीडित हैं । यहां तक की मैं मेरे शहर स्विटजरलैंड में भी वही बात महसूस करता था जो स्वीडन में मैंने महसूस किया, हालां की स्विटजरलैंड का जीवन सुविधाओं से भरा है और उस्का महत्व ऊँचा है। इन सब विषयों को देखते हुए मेरे भीतर पूर्वि र्धमों का ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यक्ता पैदा हुई, तो मैंने सबसे पहले हिन्दू पढ़ना शुरू किया, लेकिन मै उस्से संतुष्ट नही हुआ, तो फिर मैने इस्लाम र्धम को पढ़ना प्रारंभ किया, तो मुझे इस विषय ने इस्लाम की ओर खिंचा की इस्लाम र्धम दूस्रे र्धमों के साथ टकराव नही रखता है । बल्की इस्में सारे र्धमों के लिए स्थान है, यह र्धम सारे र्धमों के अंत मे आने वाला र्धम है । और यह बात निषचित रूप से मेरे मन में जगह बनाती गई, यहां तक की पूरी तरह से मेरे दिमाग़ में घर कर गई। "

रोजयहीढुबारही

सुवीसपत्रकार और आलोचक पत्रकार और आलोचक

रोजयहीढुबारही

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