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इस्लाम धर्म में मानव के अधिकारों का स्थान

इस्लाम धर्म में मानव के अधिकारों का स्थान

इस्लाम धर्म में मानव के अधिकारों का स्थान

राषिद अपना मोबइल फोन आन करते हुए जब मीटिंग हाल में प्रवेश किया, तो उसको माइकल की तरफ से अपने फोन पर एक सन्देश मिला, जिस में लिखा था किः अगली बैठक के लिए तैयार रहो..... कई ऐसी समस्याएँ हैं, जिस के प्रति हमें चर्चा करना ज़रूरी है, जैसे अन्य लोगों के साथ व्यवहार, अपनी इच्छाओं को दबाके रखना, बौद्धिक स्वतंत्रता .... धन्यवाद।

राषिद अपने दो मित्रों को मीटिंग हाल में बैठे हुए पाया। उन्हें प्रणाम किया फिर यह कहने लगाः

मानवीय अधिकारों से संबंधित समस्याएँ बहुत अधिक है। केवल उन्हीं समस्याओं में यह सीमित नही है, जिसका तुमने विवरण किया है प्रिय माइकल। इसी कारण मैं समझता हूँ कि एक समग्र परीधि बनाने की आवश्यकता है, जिस के संदर्भ में हम सारी समस्याओं का समाधान प्राप्त करेंगे, चाहे इस समस्याओं के बीच कितना ही अधिक अंतर हो, या कितनी ही ज्यादा दूरी हो।

माइकलः कुछ उदाहरण प्रस्तुत करने में कोई आपत्ति नही है, जैसा कि मैं ने अपने मोबइल संदेश में तुम्हें भेजा था, ताकि हमारी बात-चीत वास्तविकता पर आधारित हो, जिसका अनुसरण करना संभव हो।

राषिदः बिल्कुल सही। इस में कोई आपत्ति नही।

राजीवः हमारी पिछली बैठक में तुम ने एक नियम की चर्चा की थी, हम उसी नियम के संदर्भ में अपनी बात-चीत प्रारंभ करेंगे। वह नियम यह था कि जब हम वास्तविक रूप से अधिकारों व स्वतंत्रता की समीक्षा करना चाहें, तो हमें इस बात की आवश्यकता है कि हम उन नियमों का सम्वीक्षण करें, जिन पर यह अधिकार निर्भर है, न कि इन नियमों के मानने वाले लोगों के व्यवहार और कर्मो को देखें ।

राषिदः सच है... स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों के मूल्य का आवधारण उस बौद्धिक अनुभव से प्रभावित होती है, जिससे यह अधिकार प्रकट हुए हैं, और उस समाज के साधारण नियमों का अनुयायी होता है, जिस में वह फला-फुला है। मैं इस स्थान पर अपने मित्र माइकल से यह प्रश्न करूँगाः क्या तुम उन साधारण नियमों और बौद्धिक अनुभव का हमारे सामने विस्तार से विवरण करोगे, जिन पर पश्चिमी विचारों के अनुसार मानवीय अधिकार निर्भर है ?

माइकलः यह कहना संभव है कि पश्चिम में अधिकार और स्वतंत्रता जिस बौद्धिक और नियमित संदर्भ से निकली है, वह निम्न लिखित विषयों में प्रकट हैः

केवल बुद्धि ही इन अधिकारों व स्वतंत्रता का स्त्रोत है। हालांकि बुद्धि कुछ धार्मिक नियमों को भी अपना लेती है (जैसा कि लिब्रलिज़म प्रोटेसटन्ट सिद्धांत से प्रभावित हुवा) लेकिन बुद्धि ही इन नियमों का तिरस्कार करने या इनको स्वीकार करने का अधिकार रखती है।

लैकिकता (धर्म को जीवन और सरकार से दूर रखना) यह वह विधि है, जिस में इन अधिकारों और स्वतंत्रता का संतुलन होता है।

स्वतंत्रता व समानता। समाज के दो महत्वपूर्ण नियम हैं जिस का समाज अनुयायी होता है, और इन्हीं के साथ मिलकर अन्य समाज के साथ संयुक्त होता है। यह दोनों स्थिरांक और पवित्र नियम है, जिनका उल्लंघन असंभव है।

प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व को बढाना, और उसके हितों को महत्व देना, साथ-साथ समाज की भूमिका और उसके हितों की उपेक्षा न करना। इस से प्रसन्नता लौट आती है, और प्रत्येक सदस्य का जीवन शांतिपूर्ण होता है।

राषिदः अच्छा स्पष्ट हुवा है। इस पर मैं तुम्हारा आभारी हूँ। इससे यह मालूम होता है कि (पश्चिमी समाज द्वारा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में गिरजा घर से कट जाने का बाद) पश्चिम में मुख्य स्त्रोत भौतिक भावनाओं के साथ-साथ बुद्धि है। इसी स्त्रोत से अधिकार और स्वतंत्रता प्रकट हुए हैं, और यह भी मालूम होता है, यह अधिकार और स्वतंत्रता जिस विधि पर निर्भर है, वह लौकिकता है।

यह कहना भी संभव है कि स्वतंत्रता व समानता इसी स्त्रोत के आधार पर उन नियमों में अग्र है, जिन पर पश्चिमी समाज स्थापित हुवा है। इसी कारण (पश्चिम के स्थिर विचारों के अनुसार) इन दो नियमों को संपूर्ण रूप से प्राथमिकता प्राप्त है, जिसका समाज को अनुसरण करना, या प्रतिबंध होना, या अन्य समाज के नियमों के साथ संयुक्त होना आवश्यक है। इस स्थान पर स्वतंत्रता और समानता स्थिरांक और पवित्र चीज़ो में सब से अग्र हो जाते हैं, जिनका अपमान असंभव है, और यह संभव हो जाता है कि इन दोनों नियमों का अपमान न करने के लिए अन्य अधिकारों और नियमों का उल्लंघन हो।

यह वह विषय है, जो समग्र रूप से उन इस्लामिक नियमों से विपरीत है, जो जीवन के प्रत्येक भाग में शामिल है।

राजीवः तुम हमारे सामने उस क़ानूनी और बौद्धिक का विस्तार करो जिस में यह शब्द मानवीय अधिकार इस्लाम धर्म की सीमाओं में प्रकट होता है, ताकि हम अन्य विचारों के साथ इसकी तुलना कर सकें।

राषिदः इस्लाम धर्म में, और इस्लामी समाज में संपूर्ण रूप से एक अलग क़ानूनी विधि हैः

बुद्धि और भौतिक भावनाओं के बदले इस्लाम धर्म में नियम और सिद्धांत का प्राथमिक स्त्रोत वही (रहस्योद्घाटन) है, जिससे स्थिरांक और पवित्र विषय प्रकट होते हैं, साथ-साथ बुद्धि और भावनाओं की विशेष क्षेत्र में महत्वता की भी उपेक्षा नही की गयी।

लौकिकता के बदले इस्लाम धर्म में हम शरिअत, और धर्म का संसार के साथ संघटन पाते हैं। यही वह विधि है, जिस पर समाज निर्भर है।

स्वतंत्रता व समानता के बदले इस्लाम धर्म में हमे अल्लाह की बंदगी, और मानवता के बीच न्याय मिलता है। (न्याय का अर्थ अवश्य रूप से समानता नही है, जैसा की कुछ लोग मानते है) यह दोनों (बंदगी और न्याय) इस्लामी समाज में न्यायिक मूल में सब से अग्र है। इन दोनों की उपस्थिति और इनका अपमान न करना संपूर्ण रूप से मुख्य विषय है, अन्य समाज के नियमों (जिन में अधिकार और स्वतंत्रता के नियम भी शामिल है) का इसके साथ संयुक्त होना, या इसका पालन करना, या इसका अनुसरण करना ज़रूरी है।

व्यक्तिगत परिस्थिति के बदले इस्लाम धर्म में हमे समाज और व्यक्ति दोनों पर एक समान ज़िम्मेदारी, और आपसी प्रेम मिलता है। इन में से किसी पर अन्याय या ज़्यादती नही होती।

राजीवः अच्छा यह होगा कि हम इन दो विचारों को अन्य उन अधिकारों के सामने रखें, जिन के प्रति हमारे बीच विरोध है, ताकि परिस्थिति अधिक प्रकट हो।

माइकलः प्रत्येक प्रणाली की पृष्ठभूमि मूल्यों के आधार पर (जिन से अधिकार प्रकट होते हैं) इस्लामिक और पश्चिमी विचारों के बीच तुलना करने के लिए सिद्धांत की स्वतंत्रता के विषय को निर्धारित करना संभव है।

राषिदः सिद्धांत की स्वतंत्रता, या धार्मिक स्वतंत्रता वास्तविक रूप से तुलना करने के लिए एक उपजाऊ क्षेत्र है। इस विषय का कारण धर्म के आवधारण में और मूल्य नियमों से धर्म के संबंधित होने के प्रति दोनों (इस्लामिक व पश्चिमी) प्रणालियों के बीच पाया जानेवाला अंतर है।

पश्चिम में किसी भी सदस्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी भी धर्म को अपना लें, या नास्तिक बन जाये, या अपना धर्म छोडकर कोई और धर्म स्वीकार करलें। क्योंकि यह सिद्धांत की स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में आता है, और यह व्यक्तिगत अधिकार है, जिस में किसी की ओर से हस्तक्षेप की अनुमति नही होगी।

लेकिन साथ-साथ हम यह देखते हैं कि पश्चिम का मुसलमान, अगर हम यह मान भी लें कि वह जो चाहे सिद्धांत रख सकता है, लेकिन इसी स्वतंत्रता के साथ उसको अपने सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करने का अधिकार प्राप्त नही है। इसका अर्थ यह हुवा कि पश्चिम मुसलमान को जीवन में अपने धर्म के अनुसार उपयोग करने का अधिकार नही देता है। किन्तु पश्चिम के लोग मुसलमान को (उदाहरण के रूप में) कई पश्चिमी देशों में जानवरों को इस्लामिक विधि के अनुसार ज़िबह (वध) करने से रोकते हैं। इसी प्रकार मुसलमान को दूसरी शादी करने से मना करते हैं। कुछ देशों में मुस्लिम महिला को ऐसी वेश-भूषा से रोकते हैं जिस के प्रति उस महिला का यह विश्वास होता है कि धर्म उसके लिए यह वेश-भूषा ज़रूरी मानता है, और इस जैसे व्यवहार को मुसलमान (पुरुष हो या स्त्री) अपने धर्म का एक भाग समझता है... क्या तुम इस पश्चिमी व्यवहार का स्पष्टीकरण कर सकते हो ?

माइकलः इसलिए कि यह व्यवहार भावनाओं और मानव जाति की अंतरात्मा के संदर्भ से बाहर है, तो यह सिद्धांत की स्वतंत्रता के अधिकार से भी बाहर होगा। और इसलिए भी कि इस जैसे व्यवहार में प्रणाली, सामाजिक संस्कृति और उस क़ानून का उल्लंघन है, जिसको समाज के अधिकतर सदस्यों ने पसंद किया, और जो जीवन के मामलों से धर्म को अलग रखना आवश्यक ठहराता है।

लेकिन साथ-साथ मैं तुम्हे यह आश्वासन (गारंटी) देता हूँ कि क़ानून के अनुसार मुसलमान के लिए वैवाहिक संबंध से हटकर अन्य महिलाओं के साथ जीवन-यापन करना जायज़ है। बस शर्त यह होगी कि आपसी समझौते के साथ हो, और वैवाहिक गृह से बाहर हो।

राषिदः लेकिन जिस व्यवहार की अनुमति मुसलमान को क़ानूनी तौर पर दी गयी है, वह व्यवहार उस धर्म के विपरीत है, जिसको वह मानता और अनुसरण करता है।

निश्चित रूप से मैं मानता हूँ कि तुम (पश्चिम के लोग) इस जैसे प्रतिबंध को अधिकार और स्वतंत्रता के लिए कलंक नही समझते हैं। क्योंकि तुम लोग इस जैसे व्यवहार और धर्म के बीच कोई संबंध ही नही मानते। बल्कि तुम लोग तो इस जैसे व्यवहार को अपनी आधुनिक प्रगति (जो पवित्र स्थिरांक बन गयी) के लिए सुरक्षित और नियंत्रित रखने का कारण जानते हो।

और इसका कारण यह है कि सिद्धांत या धर्म का विचार पश्चिम की उस लौकिक दृष्टिकोण के साथ सामंजस्य हुवा है, जो धर्म को जीवन से अलग करती है। किन्तु इस नियम के अनुसार धर्म का सामाजिक प्रणाली से कोई संबंध नही, बल्कि धर्म तो एक भावना या अंतरात्मा है, जो मानव केवल अपने भीतर गुप्त रखता है। वह अपनी इस भावना में जीवन संबंधित व्यवहार से बिल्कुल अलग होता है। जैसा कि पिछली बात-चीत में तुम्हारे सामने इसका स्पष्ट किया गया।

राजीवः अब मै इस्लामिक दृष्टिकोण को समझने लगा हूँ।

राषिदः इस्लामिक विचार के अनुसार सिद्धांत की स्वतंत्रता समाज के मख्य स्थिरांक (अल्लाह की बंदगी और अनुसरण) का ध्यान रखने के संदर्भ में उपलब्ध है। इसी आधार पर इस्लामिक समाज हर उस व्यक्ति को अपनी छाया तले स्थान प्रधान करता है, जो यह घोषणा कर ले कि अल्लाह ही उस पर प्रभावी है। और हर उस व्यक्ति का तिरस्कार करे, जो अल्लाह का विद्रोही हो, और अल्लाह के क़ानून को तोडने वाला हो। इसी कारण इस्लामिक समाज में धार्मिक बहु वाद की उपलब्धी की क्षमता मिलती है, क्योंकि इस्लामिक समाज यहूदी और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों के साथ जीवन-यापन करना स्वीकार करता है, और उन्हें अपने व्यक्तिगत मामलों का आयोजन करने की स्वतंत्रता देता है। जब कि इस्लामिक समाज में इन दो धर्मो के अलावा मूर्ति पूजा या नास्तिकता के अनुयायियों का कोई स्थान नही है। इसका कारण यह है कि यहूदी और ईसाई धर्म का संबंध देवत्व धर्मो से है, और इन दोनों धर्मो का अनुसरण करने वाले अल्लाह की बंदगी और उसको प्रभु मानने के घोषणा करते हैं।

लेकिन इन दोनों धर्मो में होने वाला बदलाव (जो अल्लाह की बंदगी की वास्तविकता से टकराता है) इस्लाम धर्म के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा को उनके लिए सिद्धांत की स्वतंत्रता की सीमा को अधिक तंग कर देता है। किन्तु उन्हें अपने धर्म का प्रचार करने, और प्रार्थना गृह के बाहर उन्हें अपनी पूजा के संस्कार (जो इस्लाम धर्म के विपरीत होने का संकेत देता हो) प्रयोग करने का अधिकार नही होगा। इस सीमा से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बाहर आना, इस्लामिक समाज की प्रणाली का उल्लंघन और उसके प्राथमिक पवित्र स्थिरांक के अपमान के समान है।

माइकलः इस्लाम धर्म अपने अनुयायियों को किसी और धर्म को स्वीकार करने से रोकता है। इसके प्रति तुम्हारा क्या विचार है ?

राषिदः इस समस्या का भी संबंध मेरी पिछली बातों से है। इस्लाम धर्म को छोडने की समस्या का संबंध इस्लामिक सिद्धांत के अनुसार धार्मिक स्वतंत्रता के विचार से है। किन्तु इस्लाम धर्म किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड नही देता, जो कभी इस धर्म को स्वीकार ही न किया हो, और न किसी व्यक्ति को इस धर्म को स्वीकार करने पर मजबूर करता है। धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नही। (अल-बक़रा, 256) कह दो, यह सत्य है तुम्हारे रब की ओर से। तो अब जो कोई चाहे माने और जो चाहे इनकार कर दे। (अल-कह्फ, 29) तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म। (अल-काफ़िरून, 6)... हम साथ-साथ यह भी देखते हैं कि इस्लाम धर्म किसी अन्य धर्म को स्वीकार करने वाले व्यक्ति को रोकता और दण्ड देता है।

इस्लाम धर्म को छोडने वाले व्यक्ति के प्रति इस्लाम की परिस्थिति हम इस तरह समझ सकते हैं कि इस्लाम धर्म को छोडना उन मूल्य नियमों और सिद्धांत पर कलंक लगाने के समान है, जिन पर यह समाज निर्भर है। या दूसरे शब्दों में यह कहो कि इस्लाम धर्म को छोडना इस धर्म की वास्तविकता को ग़लत मानने की घोषणा, या मानव को इस धर्म की आवश्यकता न होने की घोषणा करना है। और यह ऐसे समाज में अस्वीकार है जिसका स्त्रोत इस धर्म की सत्यता का सिद्धांत और उसकी आवश्यकता है।

यह बिल्कुल उसी प्रकार है, जैसे पश्चिमी समाज में कोई (स्वतंत्रता का नारा लगाते हुए) पवित्र स्थिरांक स्वतंत्रता की उपेक्षा करने की अपील करे। स्वतः स्वतंत्रता के समर्थको की ओर से तुरंत तैयार जवाब मिलेगा। वह उनका यह मशहूर नारा होगाः स्वतंत्रता के दुशमनों के लिए कोई स्वतंत्रता नही है। क्योंकि यह व्यक्ति स्वतंत्रता का उपयोग स्वतंत्रता का उल्लंघन करने के लिए करेगा । यानी ऐसे मूल्य नियम और सिद्धांत का अपमान करेगा जिस का यह समाज निर्भर है।

माइकलः प्रिय राषिद। विस्तार से स्पष्टीकरण पर मै तुम्हारा आभारी हूँ.... मैं इस वाद-विवाद से संतुष्ट हूँ और यह आशा करता हूँ कि यह चर्चा चलती रहेगी ।

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