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यही वह मार्ग है।..ऐ वह व्यक्ति जो प्रसन्नता की खोज मे है।

यही वह मार्ग है।..ऐ वह व्यक्ति जो प्रसन्नता की खोज मे है।

<h2>यही वह मार्ग है।..ऐ वह व्यक्ति जो प्रसन्नता की खोज मे है।</h2>
<h3 id='1'>मानव की असहायता व आवश्यकता</h3>
<p>आप इस संसार में आने से पहले कुछ भी नही थे। जैसा कि ईशवर ने कहा । <strong>
क्या मनुष्य याद नही करता कि हम उसे इससे पहले पैदा करचुके हैं, जबकि वह कुछ भी
न था।</strong><small> (मरियम-67)</small></p>
<p>फिर ईशवर ने मिट्टी से, फिर पानी से पैदा किया। फिर आपको सुनने और देखने वाला
बनाया। ईशवर ने कहा । <strong>क्या मनुष्य पर ज़माने का ऐसा समय भी बीता है कि
वह कोई ऐसी चीज़ न था जिसका उल्लेख किया जाता ? हमने मनुष्य को ऐसा मिश्रण वीर्य
से पैदा किया, उसे उलटते-पलटते रहे, फिर हमने उसे सुनने और देखने वाला बना दिया।
</strong><small>(अल दहर 1-2)</small></p>
<p>फिर आप धीरे-धीरे बलहीन से बलवान बन गये। लेकिन अंत में आपका परिणाम बलहीन होना
है। ईशवर ने कहा । <strong>अल्लाह ही है जिसने तुम्हे निर्बल पैदा किया, फिर निर्बलता
के बाद शक्ति प्रदान की, फिर शक्ति के बाद निर्बलता और बुढ़ापा दिया। वह जो कुछ
चाहता है पैदा करता है, वह जानने वाला, सामर्थ्यवान है। </strong><small>(अल रूम-54)</small></p>
<p>फिर निस्संदेह अंत मृत्यु है। </p>
<p>आपका इन स्थिति में एक कमजोरी से दूसरी कमजोही की ओर परिवर्तन होते रहता है।
आप स्वयं से कोई नष्ट दूर नही कर सकते। आप ईशवर द्वारा स्वयं पर की गई अनुग्रह
कि सहायता के बिना किसी प्रकार का लाभ नही उठा सकते। आप प्रकृति के अनुसार अन्य
चीजों पर आधार रहते हैं। आप अपनी जीवन शाश्वत रखने में कई ऐसी चीजों क् ज़रूरत
मंद हैं, जो आपके बस के बाहर है। कभी आपको वो चीजें प्राप्त होजाती हैं, कभी आपसे
छीन लिये जाते हैं। कितनी ऐसी चीजें हैं जो आपके लिए लाभदायक है, आप उसको प्राप्त
करना चाहते हैं। कभी आप उसको पाते हैं और कभी नही। कितनी ऐसी चीजें हैं जो आपके
लिये नष्ट दायक है। आपकी इच्छाओं, और प्रयासों को नष्ट करने वाली है। आपके लिए
समस्या और मुसीबतों का कारण है, आप इन चीजों को स्वयं से दूर करना चाहते हैं। कभी
आप दूर करलेते हैं और कभी नही। <strong>क्या आप ईशवर पर आधारित होने की भावना नही
पाते हैं। ईशवर यह कहता है – ऐ लोगों। तुम्ही अल्लाह के मुहताज हो और अल्लाह तो
निस्पृह, स्वतः प्रशंसित है। </strong><small>(फातिर-15)</small></p>
<p>आप वैरस से पीडित हो जाते हैं। इस वैरस को आप के आँख देख नही पाती। जो आपको
बीमार करदेती है। आप स्वयं की सुरक्षा नही कर पाते। आप अपने जैसे कमज़ोर मानव के
पास चिकित्सा के लिए जाते हैं, कभी वह सही औषध देता है और कभी वह असहाय होता है।
तो पीडित और चिकित्सक दोनों भ्रम में रह जाते हैं। ऐ मानव तू कितना ही कमज़ोर है,
अगर आप से मख्खी कोई चीज़ छीनले, तो आप उसको पुनः प्राप्त नही कर सकते हैं। ईशवर
ने सत्य कहा <strong>ऐ लोगों। एक मिसाल पेश की जाती है, उसे ध्यान से सुनो। अल्लाह
से हटकर तुम जिन्हें पुकारते हो वे एक मख्खी भी पैदा नही कर सकते। यद्यपि इसके
लिए वे सब इकट्ठे हो जायें और यदि मख्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाये तो उससे वे
उसको छुडा भी नही सकते। बेबस और असहाय रहा चाहनेवाला भी (उपासक) और उसका अभीष्ट
(उपास्य) भी। </strong><small>(अल-हज, 73)</small></p>
<p>जब आप स्वयं से मख्खी की खीची हुई चीज़ को बचा नही सकते, तो फिर आप अपनी किस
चीज़ के मालिक हैं। आपका माथा ईशवर के हाथ मे है। आपकी जान उसी के हाथ मे है। आपका
दिल उसके दो उँगलियों के बीच मे है, आपका जीवन और मृत्यु उसी के वश मे है। आपकी
प्रसन्नता और अप्रसन्नता उसी के आदेश से है। आपका चलना, फिरना, बोलना सब कुछ ईशवर
के अनुमति से है। आप उसी के आदेश से चलते हैं, और उसी के अनुमति से कर्म करते हैं।
अगर वह आपको स्वयं ही को सोंपदे, तो आपको असाहयता, निर्बल, और पाप की ओर सोंपने
के समान होगा। अगर वह आपको किसी और को सौंपदे, तो उस व्यक्ति की ओर सौंपने के समान
होगा, जो आपके लिए, लाभ, कष्ट, जीवन, मृत्यु और दुबारा उठाये जाने का मालिक नही
होता है। इसी कारण ईशवर से आपको पल भर के लिए भी कोई दूसरा साधन नही है। बल्कि
आप आंतरीय और बाह्य रूप से जीवन भर ईशवर पर आधारित है। जो आप पर अपनी अनुग्रह निछावर
करता है। जबकि आप हर प्रकार से ईशवर के आवश्यकता के बावजूद पाप और बुरे कामों से
उसका उल्लंघन करते हैं। निश्चित रूप से आपने उसे भुला दिया, जबकी आपको उसी की ओर
लौटना है, और उसी के सामने खडा होना है। ऐ मानव अपने पापों का बोझ उठाने से असहाय
और निर्बल होने का कारण <strong>अल्लाह चाहता है कि तुमपर से बोझ हलका करदें, क्योंकि
इनसान निर्बल पैदा किया गया है। </strong><small>(अननिसा, 28)</small></p>
<h3 id='2'>मानव की अयहायता पर अल्लाह की दया</h3>
<p>ईशवर ने रसूलों को भेजा, पुस्तकें अवतरित की, नियम लागू किये। आपके सामने सीधा
मार्ग बनाया। सबूत, प्रमाण, और निशानियाँ प्रदान की यहाँ तक कि हर विषय में आपके
लिए एक निशानी रखी, जो ईशवर की एकीकरण और पूज्य प्रभु होने का खुला सबूत है। इन
सब बातों के साथ-साथ आप कुछ लोगों को देखेंगे जो सत्य को असत्य से मुकाब्ला करते
हैं। शैतान या किसी और को ईशवर के अतिरिक्त अपना दोस्त बनाते हैं और असत्य के प्रति
झगडते हैं। <strong>हमने लोगों के लिए इस ख़ुरआन मे हर प्रकार के उत्तम विषयों
को तरह-तरह से बयान किया है, किन्तु मनुष्य सबसे बढ़कर झगडालू हैं।</strong>
<small>(अल-कहफ-54)</small></p>
<p>क्या आप ईशवर की सारी वो अनुग्रहें भूल गये जिसमे आप रात-दिन बिताते हैं। क्या
आपको याद नही कि आप गंदे पानी से पैदा किये गये हैं। आप का अंतिम स्थान ख़बर (समाधी)
है। आपको स्वर्ग या नर्क की ओर लौटना है। <strong>क्या (इनकार करनेवाला) मनुष्य
ने देखा नही कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया ? फिर क्या देखते हैं कि वह प्रत्यक्ष
विरोधी, झगडालू बन गया। और उसने हम पर फब्ती कसी और अपनी पैदायिश को भूल गया। कहता
है, कौन हड्डियों में जान डालेगा जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी। कह दो, उनमें
वही जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया। वह तो प्रत्येक सृष्टि (मख़लूक)
को भाली-भाँती जानता है। </strong><small>(यासीन, 77-79)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा <strong>ऐ मनुष्य। किस चीज़ ने तुझे अपने उदार प्रभु के विषय में
धोके मे डाल रखा है। जिसने तेरा प्रारूप बनाया, फिर नख-शिख से तुझे दुरुस्त किया
और तुझे संतुलन प्रदान किया। </strong><small>(अल-इनफितार 6-7)</small></p>
<h3 id='3'>सब से प्रमुख अनुग्रह</h3>
<p>ऐ मनुष्य। तू क्यों स्वयं को ईशवर के एकीकरण और उसकी महानता की रुची से वंचित
रखता है। यह रुची ईशवर के सामने खडे होकर विनती करना है, ताकि वह तुम्हे गरीबी
से मुक्ति दिलाये। बीमारी से स्वास्थ प्रदान करे, आपके दुख दूर करें आपके पाप क्षमा
करें। आपको कष्टों से दूर रखें, अगर आप अन्याय से पीडित हो तो आपकी सहायता करें।
अगर आप भ्रम या पथ भ्रष्ट से पीडित हो तो आपका मार्ग निर्देशन करें। अगर आप अज्ञान
हो तो आपको ज्ञान प्रदान करें। जब आप डरने लगे तो आपको सुख दे। आप निर्बल हो तो
आपके साथ दया करें। आपके शत्रुओं को आपसे दूर रखें और आपको रोज़ी दें। ऐं मनुष्यः
धर्म की अनुग्रह के बाद मानव पर ईशवर द्वारा होने वाली सबसे महत्वपूर्ण अनुग्रह
बुद्धि है। ताके वह लाभदायक और नष्ट दायक चीज़ों के बीच अंतर करे। वह ईशवर द्वारा
मिलने वाले आदेश व निशेध को समझें और वह सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करें।
वह लक्ष्य एक ईशवर की बंदगी (उपासना) है। जिसका कोई साझी नही । <strong>तुम्हारे
पास जो भी नेमत है वह अल्लाह ही की ओर से है। फिर जब तुम्हें कोई तकलीफ पहुँचती
है तो फिर तुम उसी के आगे चिल्लाते और फरियाद करते हो। फिर जब वह उस तकलीफ को तुमसे
टाल देता है तो क्या देखते हैं कि तुममें से कुछ लोग अपने रब के साथ साझीदार ठहराने
लगते हैं। </strong><small>(अल-नहल, 53-54)</small></p>
<div class="shahed">
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<h4>जेवरी लाँग</h4>
<h5>अमेरिकन गणित अध्यापक</h5>
<h6>वह मुझे मुझ से अधिक जान्ता है</h6>
<span>ख़ुरआन महान पुस्तक ने अपनी शक्ति से मुझे बंधी बनादिया। मेरे दिल का मालिक
बन गया। ईशवर के सामने आत्मसमर्पण करने वाला बना दिया। ख़ुरआन आख़री लम्हे तक अपने
पढ़ने वाले के लिए लाभ दायक है। इस प्रकार कि ख़ुरआन को पढ़ने वाला अपने भीतर प्रजापति
ईशवर के सामने तन्हा खड़े होने की भावना पाता है। जब आप ख़ुरआन को गंभीरता से लेंगे,
तो आप के लिए साधारण रूप से इसको पढ़ना संभव नही होगा। ख़ुरआन आप पर इस तरह प्रभावित
हो जायेगा, जैसे आप पर उसका कोई अधिकार हो। वह आप से बहस करेगा, आपको शरमिन्दा
करेगा, आपको चुनौती देगा । मैं एक दूसरे पक्ष पर खड़ा था। फ़िर मुझे यह ज्ञान हुवा
कि ख़ुरआन का अवतरित करने वाला मुझे मुझ से ज़्यादा जान्ता है। ख़ुरआन सदा मेरे
विचारों से आगे रहता था। वह मेरे प्रश्नों का उत्तर देता है। हर रात मैं अपने प्रशनों
को अपने दिमाग़ में रखता था, लेकिन दूसरे दिन मुझे इसके उत्तर मिल जाते थे। मैने
ख़रआन के पन्नों में साफ़-साफ़ अपने आप को पाया है।</span></div>
<p>ऐ मनुष्य। निश्चय बुद्धीमान मानव उच्च चरित्र से प्रेम करता है और तुच्छ आचार
न पसंद करता है। यह चाहता है कि ईशवर के रसूलों और धर्मपरायणों में से हर अच्छे
व्यक्ति का पालन करे। उसके मन मे यह इच्छा होती है कि वह उनमें मिल जायें, हालांकी
वह उन्हे पा नही सकता। इसका मार्ग वही है जिस कि ओर ईशवर ने अपनी वाणी मे मार्ग
दर्शन किया है। <strong>कह दो, यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण
करो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा करदेगा। अल्लाह
बडा क्षमाशील, दयावान है। </strong><small>(आले-इमरान, 31)</small></p>
<p>जब मनुष्य उसका पालन करेगा, तो ईशवर उसको नबी, रसूल, शहीद और अच्छे लोगों के
साथ करदेता है। ईशवर ने कहा। <strong>जो अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करता
है, तो ऐसे ही लोग उन लोगों के साथ हैं जिनपर अल्लाह कि कृपादृष्टि रही है, वे
नबी, सिद्दीक़, शहीद और अच्छे लोग हैं। और वे अच्छे साथी हैं।</strong><small>
(अल-निसा, 69)</small></p>
<h3 id='4'>सोंचो और विचार करो</h3>
<p>ऐ मनुष्य। मैं तुझे यह सलाह देता हूँ कि तू एकांत मे बैठ जा, फिर जो सत्य तेरे
पास आया है उसमे विचार कर। इस सत्य के प्रमाणों में ग़ौर कर। अगर तू इसको वास्तविक
रूप से सत्य समझ रहा है, तो इसका अनुपालन प्रारंभ करदे, परमपराओं और समाज का बंदी
न बन। यह जानले कि तेरे साथीयों, बन्धुओं और पुर्षों की विरासत से अधिकतर प्रभुत्व
स्वयं तेरा व्यक्तित्व है। ईशवर ने इसी बात कि सलाह काफ़िरों को दी और इस ओर प्रोत्साहित
किया। ईशवर ने कहा। <strong>कहो, मैं तुम्हे बस एक बात की नसीहत करता हूँ कि, अल्लाह
के लिये दो-दो और एक-एक करके उठ खडे हों, फिर विचार करो, तुम्हारे साथी को कोई
उन्माद नही है। वह तो एक कठोर यातना से पहले तुम्हे सचेत करनेवाला है। </strong>
<small>(सबा, 46)</small></p>
<p>ऐ मनुष्य। जब तो स्वयं का अनुसरण करदे, तो कदापि तुझे कोई नष्ट नही होगा। ईशवर
ने कहा। <strong>उनका क्या बिगड़ जाता यदि वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाते
और जो कुछ अल्लाह ने उन्हे दिया है उसमें से ख़र्च करते। अल्लाह उन्हें भली-भाँती
जानता है।</strong><small> (अल-निसा, 39)</small></p>
<p>यानी अगर वह ईशवर पर विश्वास रखलें, और ईशवर की अवतरित की हुई बातों को मानलें,
तो उसका क्या नष्ट होगा। आगर वह अच्छे कार्य करनेवाले के लिए अन्तिम दिन में पुण्य
कि आशा रखते हुए ईशवर पर यख़ीन रखले तो उसका क्या घाटा होगा। अगर वह ईशवर कि दी
हुई चीजों को उसकी इच्छा के अनुसार खर्च करदें तो उसका क्या नष्ट होगा। ईशवर उनकी
अच्छी और बुरी आशा को जानता है। इसका भी ज्ञान उसको प्राप्त है कि कौन इनमें से
सुधार के खाबिल है, तो वह उसको सुधारता है और उसको मार्गदर्शन की ओर लेजाता है,
उसको ऐसे अच्छे कार्य करने के खाबिल बनाता है जिससे वह संतुष्ट हो जाता है। ईशवर
यह जानता है कि कौन अपमान के ख़ाबिल है, और कौन उसके प्रभुत्व दरबार से धुत्कार
दिये जाने के लायख़ है। यह वह दरबार है, जो इस से धुत्कार दिया जाता है, निश्चय
वह संसार और परलोक में घाटा उठाने वाला है। </p>
<p>निस्संदेह आप अगर इस्लाम स्वीकार करलें तो, इस्लाम आप के और आपकि इच्छाओं के
बीच, या ईशवर द्वारा वैध की हुई चीज़ों के उपयोग करने के बीच आड़ नही बनता। बल्कि
ईशवर आप के हर उस कार्य पर आपको पुण्य प्रधान करेगा, जो आप ईशवर कि खुशी प्राप्त
करने के कारण करते हो। चाहे वह कार्य आपके संसारिक जीवन के लिए उपयुक्त हो, और
आपके धन, स्थिती या सम्मान के अधिक होने का कारण हो। बल्कि वह वैध चीज़ें आप इस
ख़याल से अपने उपयोग में लाते हो, कि आप अवैध से दूर रहकर केवल वैध ही का उपयोग
करेंगे, तो आपको इस पर भी ईशवर द्वारा पुण्य मिलेगा ।</p>
<p>ऐ मनुष्य। निश्चय ईशवर के रसूल सत्य लेकर आये, और ईशवर के संदेश को पहुँचाए।
मनुष्य को ईशवर कि भेजी हुई शरियत (धार्मिक नीयम) का ज्ञान प्राप्त करने कि अवश्यकता
है, ताकि वह संसारिक जीवन दूरदर्शिता के साथ यापन करें, और परलोक में सफ़लता प्राप्त
करनेवाला बनें। ईशवर ने कहा। <strong>ऐ लोगों। रसूल तुम्हारे पास तुम्हारे रब की
ओर से सत्य लेकर आ गया है। अतः तुम उस भलाई को मानो जो तुम्हारे लिये जुटाई गयी
है और यदी तुम इन्कार करते हो तो आकाशों और धरती में जो कुछ है, वह अल्लाह ही का
है। और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है। </strong><small>(अल-निसा, 170)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>कह दो, ऐ लोगों। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से सत्य
आ चुका है। अब जो कोई मार्ग पर आयेगा तो वह अपने ही लिए मार्ग पर आयेगा और जो कोई
पथ भ्रष्ट होगा तो वह अपने ही बुरे के लिये पथभ्रष्ट होगा। मै तुम्हारे ऊपर कोई
हवालेदार तो हूँ नही। </strong><small>(यूनुस-108)</small></p>
<h3 id='5'>अल्लाह बेनियाज़ है</h3>
<p>ऐ मनुष्य। अगर तू इस्लाम स्वीकार करलें तो स्वयं आप का लाभ है। अगर आप इस्लाम
का तिरसकार करें, तो स्वयं आप का नष्ट है। ईशवर को आप कि प्रार्थना की अवश्यकता
नही। क्योंकि पापियों के पाप से कोई नष्ट और आज्ञाकारिताओं कि आज्ञाकारी से कोई
लाभ ईशवर को नही है। कदापी ईशवर के ज्ञान के बिना कोई पापी पाप नही कर सकता और
उसकी आज्ञा के बिना कोई आज्ञाकार नही बन सकता। ईशवर ने कहा। <strong>तुम्हारे पास
तुम्हारे रब की ओर से आँख खोल देनेवाले प्रमाण आ चुके हैं, तो जिस किसी ने देखा,
अपना ही भला किया और जो अन्धा बना रहा तो वह अपने ही को हानि पहुँचायेगा। और मैं
तुम पर कोई नियुक्त रखवाला नही हूँ।</strong><small> (अल-अनआम, 104)</small></p>
<div class="shahed">
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<h4>नसीम सोसह</h4>
<h5>ईराख़ का यहूदी लेकचरर</h5>
<h6>पश्चीमी सभ्यता की गहराई</h6>
<span>जिस व्यक्ति ने पश्चीमी सभ्यता की गहराई देखा हो। उसकी सारे विषयों का ज्ञान
प्राप्त किया हो। इस सभ्यता को ज्ञानिक और वास्तविक रूप से अच्छी तरह परखा हो।
तो वह अन्तरीक आत्मा की शक्ती से इस्लामिक सिद्धांत के सामने समर्पण करता है। ताकि
इस सिद्धांत द्वारा अपनी प्यास बुजाये।</span></div>
<p>निश्चय ईशवर ने कहा, जैसा की उसके रसूल ने हमें सूचना दी हैः ऐ मेरे बन्दों
मैने अपने आप पर अन्याय को अवैध समझा है। इसको तुम्हारे बीच भी अवैध टहराया है।
तुम आपस में एक-दूसरे के साथ अन्याय मत करो। ऐ मेरे बन्दों तुम सब गुमराह हो, केवल
वह व्यक्ति गुमराह नही है जिसका मैने मार्गदर्शन किया हो। परन्तु तुम मुझसे मार्गदर्शिनी
कि प्रार्थना करो, तो मै तुम्हे सीधे पथ की ओर मार्गदर्शन करूँगा । ऐ मेरे बन्दों
तुम सब भूके हो। केवल उस व्यक्ति के अतिरिक्त जिसको मैने खिलाया है। परन्तु तुम
मुझसे भोजन मांगो, मैं तुम्हे खिलाऊँगा। ऐ मेरे बन्दों तुम निर्वस्त्र हो। केवल
उस व्यक्ती के अतिरिक्त जिसको मैने वस्त्र प्रदान किया। परन्तु तुम मुझ से वस्त्र
माँगो मैं तुम्हे दूँगा। ऐ मेरे बन्दों तुम रात, दिन पाप करते हो, मैं तुम्हारे
सारे पाप क्षमा करता हूँ, परन्तु तुम मुझसे क्षमा चाहो, मैं तुम्हे क्षमा करूँगा।
ऐ मेरे बन्दों कदापी तुम्हारे भीतर इतनी क्षमता नही कि तुम नष्ट पहुँचा सको, और
न इतनी क्षमता है कि तुम मुझे लाभ पहुँचा सको। ऐ मेरे बन्दों अगर तुममें से प्रथम
और अंतिम व्यक्ति, मनुष्य और जिन्न सारे के सारे किसी एक अधिकतर धर्म प्रायणत व्यक्ति
के समान हो जायें, तो भी इस से मेरे राज्य में कोई वृद्धि नही होगी। ऐ मेरे बन्दों
अगर तुममें से प्रथम और अंतिम व्यक्ति, मनुष्य और जिन्न सारे के सारे किसी एक अधिकतर
पापी के समान हो जायें, तो भी मेरे राज्य में कोई कमी नही होगी। ऐ मेरे बन्दों
अगर तुममें से प्रथम और अंतिम व्यक्ति, मनुष्य और जिन्न सारे के सारे एक प्लाटर्फ़ाम
पर इकट्ठा हो जायें, और मुझसे माँगो, तो मैं हर व्यक्ति की इच्छा पूरी करूँगा।
इस से मेरे ख़ज़ाने मे बिल्कुल उसी समान कमी होगी, जिस समान कि सूई से समुद्र में
होती है। ऐ मेरे बन्दों तुम्हारे इन कार्यों की संख्या मेरे पास है। फिर मै तुम्हे
इसका पूरा-पूरा बदला दूँगा। जो अच्छा बदला पाले, वह ईशवर कि प्रशंसा करे, और जो
बुरा बदला पाये, वह स्वयं अपने आप को दोशी टहराये। (इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने
वर्णन किया है)</p>
<div class="shahed">
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<h4>बरनार्ड शाह</h4>
<h5>ब्रिटीष लेखक</h5>
<h6>प्रसन्नता और शाँती के स्थंभ</h6>
<span>वर्तमान काल में पश्चिम मुहम्मद कि तत्वदर्शता का ज्ञान प्राप्त करने लगा
है। उनके धर्म से प्रेम करने लगा है। इसी प्रकार पश्चिम मध्यकाल में अपने कुछ वैज्ञानिकों
की ओर से लगाये गये आरोपों से इस्लामी सिद्धांत को आज़ाद किया है। मुहम्मद का धर्म
ही वह विधी होगा जिस पर प्रसन्नता और शाँति आधारित होगी। इसी धर्म के दर्शन ही
पर सारी समस्याओं और दुविधाओं का समाधान है।</span></div>
<p>ऐ मनुष्य यही वह मार्ग है, इसके अतिरिक्त संसार और परलोक में प्रसन्नता के लिये
कोई और मार्ग नही। सारे अन्य मार्ग अप्रसन्नता, दुख और विनाश के मार्ग है। ईशवर
ने कहा।<strong> और यह कि यही मेरा सीधा मार्ग है, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे
मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हें उसके मार्ग से हटाकर इधर-उधर करदेंगे। यह वह बात
है जिसकी उसने तुम्हें ताकीद की है ताकि तुम (पथभ्रष्टता से) बचो।</strong>
<small>(अल-अनआम, 153)</small></p>
<p>जो व्यक्ति प्रसन्नता का मार्ग चले, वह प्रसन्नता प्राप्त करलेगा। जो व्यक्ति
दूसरे अन्य मार्ग चले, वह भटक जायेगा। ईशवर के मार्ग से दूर हो जायेगा, और कभी
प्रसन्नता के मार्ग को प्राप्त नही कर सकेगा।</p>
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