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नैतिकता का मार्ग

नैतिकता का मार्ग

<h2>नैतिकता का मार्ग</h2>
<h3 id='1'>ईमान (विश्वास) का नैतिकता से संबंध</h3>
<p>प्रसन्नता के मार्ग में निश्चित रूप से नैतिकता उमड़ती है। इस मार्ग के अनुयायी
के लिये इस मार्ग के वश में प्रेम, न्याय, सत्यता, उदार, सहिष्णुता, क्षमा, शर्म,
शांति, विनम्रता, हमदर्दी, करूणा, सलाह और इसके अतिरिक्त अधिकतर उच्च आचार की इस
मार्ग में उपलब्धी आवश्यक है। साथ-साथ यह मानवीय महत्व और उच्च चरित्र के आशाओं
का मार्ग है। चरित्र कोई विलासित सामाग्री नही है, जिसके बिना जीवन यापन करना संभव
हो। बल्कि चरित्र का स्थान उन सारे नियमों में सब से प्रथम है, जिन पर जीवन कि
दिशा निर्भर होती है। अगर प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र अच्छे हों तो इसका सकारात्मक
परिलक्ष उनके जीवन और समाज पर होता है, चाहे वे सब दुर्भाग्यशाली और अप्रसन्न हो।
इसी कारण इस्लाम ने अपने अनुयायियों के मन में उच्च चरित्र के बीज बोने और इनका
वास्तविक जीवन में उपयोग करने पर प्रोत्साहित किया। निश्चय ईशवर के रसूल ने स्वयं
ईशवर द्वारा प्रवेश होने का पहला लक्ष्य यह वर्णन कियाः निस्संदेह मुझे नैतिकता
को संपूर्ण करने के लिये भेजा गया। (इस हदीस को इमाम बैहक़ी ने वर्णन किया।) तो
मालूम यह हुआ कि मानवता के इतिहास में सबसे बडी सभ्यता कि स्थापना करने के लिये
हर समय और स्थान में फैलनावाला इस्लामिक संदेश, जिसको प्रस्तुत करनेवाले ने प्रकाश
को पहुँचाने और लोगों को उसके आस-पास इकट्ठा करने में अधिक प्रयत्न किया है, यह
संदेश अपने भीतर मानवीय चरित्र को उच्च बनाने, मानवता को पवित्र बनाने और उनके
सामने पूर्णता की संभावनायें रोशन करने के अतिरिक्त कोई और लक्ष्य नही रखता है।</p>
<div class="shahed">
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<h4>गौस्तव लुबोन</h4>
<h5>फ्रेंच इतिहासकार</h5>
<h6>नैतिकता के नियम</h6>
<span>ख़ुरआन में नैतिकता के नियम उच्च है ख़ुरआन के आभारी समूहों के चरित्र बदलते
समय के साथ बिल्कुल ईसाइ धर्म के अनुयायी समूहों के समान बदल गए। अधिकतर महात्वपूर्ण
परिणाम यह है कि ख़ुरआन अपने आदेशों का अनुसरण करने वाले समूहों पर प्रभावित है।
इस्लाम के समान दूसरे धर्मों के लोगों के दिलों पर बहुत ही कम प्रभाव है। किन्तु
आप कोई ऐसा धर्म नही पायेंगे, जो इस्लाम के प्रकार सदा प्रभावी रहा हो। ख़ुरआन
पुरब के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। जीवन के छोटे से छोटे भाग में इसका प्रभाव
दिखता है।</span></div>
<p>रसूल के प्रवेश होने का लक्ष्य उच्च चरित्र और उसका विकास है। इसी प्रकार मानवता
को पवित्र बनाना है। निश्चय लोग (आप के प्रवेश होने से पहले) इस चरित्र की अधिकतर
चीज़ों से गुमराही में थे। न उसका ज्ञान रखते थे और न इसकी तरफ ध्यान देते थे।
ईशवर ने कहा। <strong>वही है जिसने उम्मियों में उन्हीं में से एक रसूल उठाया जो
उन्हें उसकी आयतें पढकर सुनाता है, उन्हें निखारता है और उन्हें किताब और हिकमत
(तत्तवदर्शिता) की शिक्षा देता है, निस्संदेह इससे पहले तो वे खुली हुई गुमराही
में पडे हुए थे। </strong><small>(अल-जुमुआ, 2)</small></p>
<p>ईशवर ने यह भी कहा। <strong>जैसा कि हमने तुम्हारे बीच एक रसूल तुम्हीं में
से भेजा जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हें निखारता है, और तुम्हे किताब
और हिकमत (तत्तवदर्शिता) की शिक्षा देता है और तुम्हें वह कुछ सिखाता है जो तुम
जानते न थे।</strong><small> (अल-बक़रा, 151)</small></p>
<p>ईमान (विश्वास) का नैतिकता से संबंध ।</p>
<p>ईमान वह शक्ति है, जो मुस्लिम को अच्छी चीज़ों की ओर आकर्शित करती है। बुरी
चीज़ों और पाप से दूर रखती है। किन्तु चरित्र की गिरवट ईमान की कमी का प्रमाण है।
इसी प्रकार चरित्र की ऊँचाई ईमान की दृढ़ता कि निशानी है। ईशवर के रसूल ने यह विवरण
किया है कि दृढ़ ! ईमान निश्चित रूप से दृढ़ ! चरित्र पैदा करता है। चरित्र की
न्यूनता ईमान की कमज़ोरी या बिल्कुल ईमान न होने का कारण है। परन्तु मुस्लिम के
अतिरिक्त हर व्यक्ति किसी कि परवाह किये बिना नीच कार्य करता है। किसी के दोशी
टहराने का उसको डर नही होता, और न वह अपने बुरे कार्यों का हिसाब-किताब रखता है।
ईशवर के रसूल कहते हैः शर्म और ईमान दोनों आपस में संबंधित है। अगर इनमें से एक
समाप्त हो जाये, तो दूसरा भी समाप्त हो जाता है। (इस हदीस को इमाम बैह्ख़ी ने वर्णन
किया।) बल्कि रसूल ने पडोसी के साथ दुर्व्यवहार को ईमान के न होने का प्रमाण माना
। रसूल कहते हैः ईशवर की क़सम कोई मोमिन नही हो सकता। ईशवर की क़सम कोई मोमिन नही
हो सकता। ईशवर की क़सम कोई मोमिन नही हो सकता। लोगों ने पूछाः यह क्या बात है ईशवर
के रसूल ? आप ने कहा वह व्यक्ति जिसका पड़ोसी उसके दुर्व्यवहार से सुरक्षित न हो।
लोगों ने कहाः यह दुर्व्यवहार क्या है ? आप ने कहाः बुरा व्यवहार। (इस हदीस को
इमाम बुख़ारी ने वर्णन किया।) इसी कारण जब ईशवर अपने भक्तों को भलाई की ओर बुलाता
है, या बुराई से घृणा पैदा करता है, तो इसको उनके मन में स्थिर ईमान का परिणाम
मानता है। कितनी बार ईशवर ने अपनी वाणी में यह कहा। <strong>ऐ। ईमान वालों।</strong></p>
<p>फिर इसके बाद ईशवर ईमान वालों पर लागू होने वाली चीज़ों का विवरण करता है। जैसे
उसका यह आदेश <strong>ऐ ईमान लानेवालों। अल्लाह का डर रखो और सच्चे लोगों के साथ
हो जाओ। </strong><small>(अल-तौबा, 119)</small></p>
<p>इसी प्रकार आप रसूल को देखेंगे कि जब वह अपने अनुयायियों को उच्च चरित्र की
शिक्षा देते हैं, तो इसको भी ईमान से संबंधित करदेते हैं। जैसे आपकी यह आज्ञाः
जो व्यक्ति ईशवर पर और अंतिम दिन पर विश्वास रखता है, तो उसको अपने अतिथि का सम्मान
करना चाहिए। जो व्यक्ति ईशवर और अंतिम दिन पर विश्वास रखता है, तो उसको पड़ोसी
का ख्याल रखना चाहिये। जो व्यक्ति ईशवर पर और अंतिम दिन पर विश्वास रखता है, तो
उसको चाहिये कि अच्छी बात बोले या मौन रहे। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन किया।)
इसी प्रकार इस्लाम मन में उच्च चरित्र के बीज बोने के लिए सच्चे ईमान और उसकी पूर्णता
पर निर्भर करता है।</p>
<h3 id='2'>प्रार्थना और नैतिकता </h3>
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<h4>टोल्सटियो</h4>
<h5>रशियन लेखक</h5>
<h6>निम्न आचार</h6>
<span>मुहम्मद के सम्मानित होने के लिए यह बात काफी है कि उन्हों ने नीच अत्याचारिक
समूहों को निम्न आचार की पकड़ से मुक्ती दिलाई। उन्के सामने विकास और परिवर्तन
के मार्ग खोल दिये। मुहम्मद का लाया हुआ धर्म बुद्धी और तत्वदर्शता के अनुसार होने
के कारण सारे संसार पर शासन करेगा ।</span></div>
<p>इस्लाम में प्रार्थनायें रहस्यमय बातें और बिना किसी लक्ष्य के संचलित नही है।
बल्कि यह वह बातें और संचलन है जो मन को पवित्र और जीवन को सुखी बनाता है। इस्लाम
के अध्यादेशों का लक्ष्य यह होता है कि मुस्लिम उच्च चरित्र के साथ जीवन-यापन करें
और सदा इन चरित्र को अपनायें, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही क्यों न बदल जायें। ख़ुरआन
और हदीस दोनों इस तथ्य को खोल कर विवरण करते हैं। किन्तु नमाज़ का जब ईशवर ने आदेश
दिया, तो यह विवरण किया कि नमाज़ बुरे और ग़लत आचार से रोकती है। ईशवर ने कहा।
<strong>उस किताब को पढ़ो जो तुम्हारी ओर प्रकाशना के द्वारा भेजी गयी है, और नमाज़
का आयोजन करो। निस्संदेह नमाज़ अश्लीलता और बुराई से रोकती है। और अल्लाह कि याद
करना तो बहुत बडी चीज़ है। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम रचते और बनाते हो।
</strong><small>(अल-अनकबूत, 45)</small></p>
<p>इस्लाम में ज़कात (दान) केवल कर (टेक्स) नही है, जो धनी से लेकर निर्धन को दी
जाती है। बल्कि इसका लक्ष्य दयालुता और कृपा के भावनाओं के बीज बोना, और विभिन्न
समूहों के बीच प्रेम और परिचय के संबंधों को दृढ़-बनाना है। साथ-साथ मन को बुराइयों
और पाप से पवित्र रखना, और समाज को सदव्यवहार कि ऊँचाइयों तक ले जाना है। ज़कात
की यही प्रथम तत्वदर्शिता है। ईशवर ने कहा। <strong>तुम उनके माल में से दान लेकर
उन्हें शुद्ध करो और उसके द्वारा उन (की आत्मा) को विकसित करो और उनके लिए दुवा
करो। निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिये सर्वथा परितोष है। अल्लाह सब कुछ सुनता,
जानता है। </strong><small>(अल-तौबा, 103)</small></p>
<p>इसी कारण दान केवल धन खर्च करने में सीमित नही है, बल्कि अधिकतर ऐसे आचार भी
दान में शुमार है, जिस से समाज और उसके सदस्य सुखी रह सके। रसूल ने तो दान कि परिभाषा
में विस्तार करते हुए यह कहाः “आपका अपने डोल का पानी किसी भाई के डोल में डालना
दान है” आपका किसी को भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना भी दान है। एक दूसरी
रिवायत मे यह आया हैः “आपका अपने भाई के सामने मुस्कुराना दान है। लोगों के पथ
से हड्डी, पत्थर और कांटा हटाना दान है” भटके हुए व्यक्ति को सीधा मार्ग बताना
भी दान है। (इस हदीस को इमाम बैहख़ि ने वर्णन किया) । उपवास कि ओर भी इस्लाम कि
दृष्टी यह नही है की उपवास केवल खाने पीने से वंचित रहने का नाम है। बल्कि इस्लाम
ने उपवास को ग़रीबों और पीडितों की कठिनाइयाँ से प्रभावित होने कि योजना माना है।
साथ-साथ उपवास को मन की मार्गदर्शनी, मान्सिक इच्छाओं और पसंद को नियंत्रित रखने
का साधन जाना है। ईशवर ने कहा। <strong>ऐ ईमान लानेवालों। तुम पर रोज़े! अनिवार्य
किये गये जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर अनिवार्य किये गये थे, ताकि तुम डर
रखनेवाले बन जाओ। </strong><small>(अल-बक़रा, 183)</small></p>
<p>रसूल ने कहाः जो झूठ बोलना और झूठ के अनुसार कर्म करना न छोडें, ईशवर को उसके
खाना और पीना छोडने कि कोई अवश्यकता नही। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन किया)
रसूल ने कहाः उपवास खाना पीना छोडने का नाम नही है। बल्कि खेल कूद और बुराई छोडने
का नाम है। किन्तु अगर आपको कोई गाली दे या आपके साथ दुर्व्यवहार करे तो आप उसको
कहोः मैं उपवास रखा हूँ। (इस हदीस को इमाम इब्ने-खुज़ेमा ने वर्णन किया) </p>
<p>तीर्थयात्रा (हज) के प्रति कभी मनुष्य यह ख़याल कर सकता है कि वह नैतिकता के
अर्थ से ख़ाली केवल एक यात्रा है। क्योंकि बहुत से धर्म कभी कभी रहस्यमय प्रश्नाओं
पर आधारित होते हैं। लेकिन मनुष्य का यह खयाल ग़लत है। इस लिए कि ईशवर ने इस धार्मिक
संस्कार के प्रति विवरण करते हुए यह कहा। <strong>हज के महीने जाने-पहचाने और निश्चित
है, तो जो इनमें हज करने का निश्चय करे तो हज में न तो काम-वासना कि बातें हो सकती
हैं और न अवज्ञा और न लडाई-झगड़े कि कोई बात। और जो भलाई के काम भी तुम करोगे अल्लाह
उसे जानता होगा। और (ईश-भय का) पाथेय ले लो, क्योंकि सबसे उत्तम पाथेय ईश-भय ही
है। और ऐ बुद्धि और समझवालों । मेरा डर रखो। </strong><small>(अल-बक़रा, 197)</small></p>
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<h4>मार्शल ब्वाज़र</h4>
<h5>फ्रेंच आलोचक</h5>
<h6>नियम और नैतिकता</h6>
<span>इस्लामिक सिद्धांत में ख़ानुनी और चारित्रिक ज़िम्मेदारी के बीच कोई अंतर
नही है। खानून और चरित्र का यह अनोखा मज़बूत संगम प्रारंभ ही से इस्लामिक विधी
के शक्तिमान होने की पुष्टी करता है।</span></div>
<p>उपरी, लिखित बातों से उन संबंधों की शक्ति का विवरण होता है, जो धर्म को नैतिकता
से जोड़ते हैं। किन्तु इस्लाम के महत्वपूर्ण स्थंभ जैसे नमाज़, रोज़ा (उपवास),
ज़कात(दान), हज(तीर्थयात्रा) और इस्लाम की दूसरी प्रार्थनायें वह मार्ग है, जो
मानवता कि पूर्णता और ऐसे सुख जीवन के विकास की ओर लेजाते हैं, जिससे उच्च चरित्र
और नैतिकता के साये में सुख और प्रसन्नता पैदा होती है। यह सारी प्रार्थनायें विभिन्न
रूप में तो लगती है, लेकिन यह सब रसूल द्वारा वर्णन किये हुए लक्ष के अनुसार एक
हैं। वह लक्ष रसूल की इस हदीस में हैः मुझे नैतिकता को संपूर्ण करने के लिए भेजा
गया। (इस हदीस को इमाम बैहक़ि ने वर्णन किया) इसी कारण प्रसन्नता का मार्ग नैतिकता
पर निर्भर है, उसी के आस-पास घूमता है, और किसी भी स्थिती में इस मार्ग के भीतर
नैतिकता प्रसन्नता से अलग नही हो सकती।</p>
<h3 id='3'>इस्लाम में नैतिकता का स्थान </h3>
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<h4>जैक यस रेज़्लर</h4>
<h5>फ्रेंच वैज्ञानिक</h5>
<h6>छोटी सी छोटी बात के नियम</h6>
<span>ख़ुरआन सारे समस्याओं का समाधान रखता है। धार्मिक और चारित्रिक नियमों के
बीच संबन्ध पैदा करता है। समाजी इत्तेहाद और विधी बनाने, कष्ट, कठोरता और मिथक
के प्रभाव को कम करने का प्रयास करता है। ख़ुरआन कमज़ोरों कि सहायता, भलाई करने
और दयालुता अपनाने का आदेश देता है। दैनिक जीवन में आपसी सहायता की छोटी सी छोटी
बात के लिये खानून बनाये हैं। व्यपार और विरासत के प्रति संतुलित नियम बनाए। पारिवारिक
भाग में हर व्यक्ति के लिये, बालक, सेवक, जानवर, स्वस्थता और वेश-भुषा के प्रति
व्यवहार को नियंत्रित किया ।</span></div>
<p>प्रसन्नता का मार्ग धर्म, चरित्र और सिद्धांत के नियमों मे नैतिकता के आधार
पर निर्भर है। ईशवर के साथ विनम्रता और विनयशीलता से इसका प्रारंभ होता है। स्वयं,
साथी, बन्धु, पड़ोसी, शत्रु, विरोधी, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों और प्रकृति के साथ,
बल्कि समुदाय और पेड़-पौधों के साथ उच्च व्यवहार पर इसका अंत होता है। यह सब बातें
बोल-चाल, क्रम, बल्कि मन और विचार में भी नैतिकता को चाहती है। बोल-चाल में उच्च
चरित्र के एक नियम का विवरण करते हुए ईशवर यह कहता है। <strong>और यह कि लोगों
से भली बात कहो। </strong><small>(अल-बक़रा, 83)</small></p>
<p>ईशवर ने कर्म में उच्च चरित्र के नियम को वर्णन करते हुए यह कहा। <strong>बुराई
को उस ढ़ंग से दूर करो जो सबसे उत्तम हो। हम भली-भाँती जानते हैं, जो कुछ बातें
वे बनाते हैं। </strong><small>(अल-मोमिनून, 96)</small></p>
<p>जो व्यक्ति ईशवर कि पवित्र किताब में सोंच-विचार करेगा, तो उसको नैतिकता के
आदेशों से पूर्ण पायेगा। आप ईशवर कि इन वाणियों में सोंच-विचार करो। ईशवर ने कहा।
<strong>अच्छाई का बदला अच्छाई के सिवा और क्या हो सकता है ? </strong><small>(अल-रहमान,
60)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और तुम एक-दूसरे को हक़ से बढ़कर देना न भूलो।
</strong><small>(अल-बक़रा, 237)</small></p>
<div class="shahed">
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<h4>टॉमस कार्लेन</h4>
<h5>स्काटलैंड का पत्रकार</h5>
<h6>आरोप</h6>
<span>भेद-भाव रखने वालों का यह अनुमान है कि मुहम्मद केवल शासन, उच्च स्थान और
व्यक्त की इच्छा रखते थे। कदापी, इशवर की ख़सम, जंगलों और खंडरात में रहने वाले
इस महान पुर्ष के दिल में सर्वश्रेष्ट आत्मा है। जो दयालुता, प्रेम, भलाई और तत्वदर्शता
से भरी हुई है। यह सारे विचार संसारिक लालच के अतिरिक्त है, और ऐसी भावनायें हैं
जो शासन और उच्च स्थान कि इच्छा के विपरीत है। क्यों नही, वह एक पवित्र आत्मा है
और उस समोह का एख व्यक्ति है, जिसका प्रेरणा और लगातार कोशीशों से ख़ाली होना संभव
नही है।</span></div>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>जो बात तुम बता रहे हो उसमें अल्लाह ही सहायक हो सकता
है। </strong><small>(यूसुफ़, 18)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और वह क़ियामत की घडी तो अनिवार्यतः आनेवाली है। अतः तुम
भली प्रकार दरगुज़र (क्षमा) से काम लो। </strong><small>(अल-हिज्र, 85)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>क्षमा की नीती अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों
से किनारा खींचो। </strong><small>(अल-आराफ, 199)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और जब वे व्यर्थ बात सुनते हैं तो यह कहते हुए उससे किनारा
खींच लेते हैं कि हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म है।
तुमको सलाम है। जाहिलों को हम नही चाहते। </strong><small>(अल-क़सस, 55)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>न अच्छे आचरण परस्पर समान होते हैं और न बुरे आचरण। तुम
(बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे
कि वही व्यक्ति, तुम्हारे और जिसके बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ट मित्र
है। </strong><small>(हा-मीम अस-सजदा, 34)</small></p>
<p>ईशवर के रसूल के चरित्र पूर्ण रूप से ख़ुरआन के अनुसार थे। कैसे आपके चरित्र
ख़ुरआन के अनुसार न होते, जबकि ईशवर ने आपके चरित्र की प्रशंसा करते हुए यह कहा।
<strong>निस्संदेह तुम एक महान नैतिकता के शिखर पर हो।</strong><small> (अल-क़लम,
4)</small></p>
<p>इसी कारण आप (मुहम्मद) को ऐसे संदेश के साथ प्रवेश किया गया, जो नैतिकता के
अतिरिक्त किसी और विषय को अधिक सम्मान नही देते। ईशवर के रसूल ने कहाः ईमानवालों
में सबसे उत्तम ईमान उस मनुष्य का है जिसके चरित्र अच्छे हो। और इनमें सबसे भला
व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार करता हो। (इस हदीस को इमाम बैहख़ी
ने वर्णन किया है) आप ने कहाः उच्च चरित्र भलाई है। बुराई वह है जो तुम्हारे मन
में पैदा हो और तुम लोगों को इसका ज्ञान होना न पसन्द करते हो। (इस हदीस को इमाम
मुस्लिम ने वर्णन किया।) आप ने कहाः निस्संदेह अश्लीलता और बुराई का इस्लाम में
कोई स्थान नही है। और लोगों में उत्तम इस्लाम उस व्यक्ति का है जिसका चरित्र अच्छा
हो। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन किया।) आपने यह भी कहाः क़ियामत के दिन मुस्लिम
के तराज़ु में सबसे ज्यादा भारी चीज़ उसके उच्च चरित्र है। और ईशवर दुर्व्यवहारी
और पापी को पसन्द नही करता है। (इस हदीस को इमाम बैहख़ी ने वर्णन किया।)</p>
<div class="shahed">
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<h4>मौंटोगो मेरीवार्ट</h4>
<h5>ब्रिटीष प्रचये विधी विचारक</h5>
<h6>न्याय और पवित्रता</h6>
<span>इस पुर्ष के अंदर अपने सिद्धांतों के लिये अत्याचार और ज़ुल्म को उठाने की
क्षमता, और इस पुर्ष को अपना सरदार और मुख्या मानने वाले, उस पर विश्वास करने वाले,
अनुयायी लोगों कि उच्च नैतिकता, इसके साथ-साथ इस पुर्ष के महान कर्म उसके व्यक्तित्व
में न्याय और पवित्रता होने का खुला प्रमाण है। मुहम्मद को केवल झूटा दावा करनेवाला
समझने से समस्याएँ और अधिक हो जायेंगी, जिसका कोई साधन नही होगा। बल्कि प्रचीन
इतिहास में कोई ऐसा व्यक्ति नही, जिस को मुहम्मद के समान सही सम्मान मिला हो।</span></div>
<p>ईशवर के रसूल कहते हैं तुम में सबसे अधिक मेरा प्रिय और मुझसे निकट वह मनुष्य
है जिसके चरित्र उच्च हो। तुममें से सबसे अप्रिय और क़ियामत के दिन मुझसे सबसे
ज़्यादा दूर वह मनुष्य है जिसके चरित्र नीच हो। यह वह लोग है, जो असत्य बातें ज्यादा
करते हैं। बिना सोंचे समझे अपने बातें कहने वाले, और सदा अपनी ज़बान चलाने वाले
है। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन किया।)</p>
<h3 id='4'>अल्लाह, लोग, पशु-पक्षी, और वातावरण के साथ अच्छा व्यवहार</h3>
<p>ईशवर के साथ उच्च व्यवहार तीन चीज़ों में व्यापक है। </p>
<p>ईशवर के साथ उच्च व्यवहार</p>
<p>प्रथमः ईशवर पर विश्वास रखना और उसकी बतायी हुई सूचनाओं को सत्य मानना। ईशवर
ने स्वयं अपने आप के प्रति यह कहा। <strong>अल्लाह के सिवा कोई इष्ट-पूज्य नही।
वह तुम्हें क़ियामत के दिन की ओर ले जाकर इकट्ठा करके रहेगा, जिसके आने में कोई
संदेह नही, और अल्लाह से बढ़कर सच्ची बात और किसकी हो सकती है। </strong>
<small>(अल-निसा, 87)</small></p>
<p>ईशवर की वाणी को सत्य मानना इस बात की आवश्यकता रखती है कि मानव इस वाणी पर
विश्वास रखें, उसकी रक्षा करें और उसके मार्ग में प्रयास करता रहे, इस प्रकार कि
ईशवर और उसके रसूल की बतायी हुई सूचनाओं के प्रति उसके मन में कोई संदेह पैदा न
हो। </p>
<div class="shahed">
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<h4>लोयेस सीडीव</h4>
<h5>फ्रेंच प्रचये विधी विचारक</h5>
<h6>नैतिक धर्म</h6>
<span>ख़रआन कि हर वाक्य (आयत) में आप ईशवर के लिये महा प्रेम का संदेश पायेंगे।
ख़ुरआन में नैतिक व्यवहार के विशेष नियमों द्वारा अच्छे कार्य पर उत्साहिक किया
गया है। ख़ुरआन में भावनाओं को आपस में बाटने, अच्छे लक्ष रखने और गाली-गलोच देने
वाले को माफ़ करने का संदेश है। ख़ुरआन में घमण्ड और ग़ुस्से को दबाया गया है।
यह संदेश दिया गया कि कभी-कभी विचार और निगाहों से भी पाप होता है। अपने वादों
को काफ़िरों (नान-मुस्लिम) के साथ भी पूरा करने का आदेश है। आत्मसमर्पण का संदेश
है। मार्गदर्शन और तत्वदर्शता से भरी हुई यह सारी बातें ख़ुरआन के नैतिक नियमों
कि पवित्रता के सबूत के लिये काफ़ी है। ख़ुरआन में हर विषय का समाधान प्रदान किया
गया है।</span></div>
<p>द्वितीयः इस बात की आवश्यकता है कि मानव ईशवर के आदेशों को स्वीकार करें। उनका
पालन करें। ईशवर के आदेशों में से किसी भी आदेश का तिरस्कार न करें। जब वह ईशवर
के किसी आदेश का तिरस्कार करें, तो यही ईशवर के साथ दुर्व्यवहार है। इसी कारण ईशवर
ने उसकी वाणी के मुक़ाब्ले में अपनी इच्छा या सलाह प्रदान करने से हमें रोका। ईशवर
ने कहा। <strong>ऐ ईमानवालों। अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो और अल्लाह का
डर रखो। निश्चय ही अल्लाह सुनता, जानता है।</strong><small> (अल-हुजुरात, 1)</small></p>
<p>तृतीयः ईशवर के बनाये हुए भाग्य को संतुष्टता और धैर्य के साथ स्वीकार करना
है। भाग्य के प्रति ईशवर के साथ उच्च व्यवहार का मतलब यह है कि मनुष्य संतुष्ट
रहें। अनुसरण करें और ईशवर के निर्णय और उसके बनाये हुए भाग्य से सुखी रहे। इसी
कारण ईशवर ने धैर्य से काम लेनेवालों की प्रशंसा की है। ईशवर ने कहा। <strong>और
धैर्य से काम लेनेवालों को शुभ-सूचना दे दो। जो लोग उस समय, जबकि उनपर कोई मुसीबत
आती है, कहते हैं, निस्संदेह हम अल्लाह ही के हैं और हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।
</strong><small>(अल-बक़रा, 155, 156)</small></p>
<p>लोगों के साथ अच्छा व्यवहार ।</p>
<p>ईशवर ने प्रत्येक मनुष्य के साथ, विशेष तौर पर माता-पिता, रिश्तेदारों (यह वह
लोग है जिनके साथ अच्छा व्यवहार करना फर्ज़ है) और पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार
करने का आदेश दिया है। ईशवर ने कहा। <strong>और याद करो जब इसराईल की संतान से
हमने वचन लिया, अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करोगे, और माँ-बाप के साथ
और नातेदारों के साथ और अनाथों और मुहताजों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे, और यह
कि लोगों से भली बात कहो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो। तो तुम फिर गये, बस तुममें
बचे थोडे ही और तुम उपेक्षा की नीती ही अपनाए रहे। </strong><small>(अल-बक़रा,
83)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>वफ़ादारी और नेकी केवल यह नही है कि तुम अपने मुँह को
पूरब और पश्चिम की ओर करलो, बल्कि वफ़ादारी तो उसकी वफ़ादारी है जो अल्लाह, अन्तिम
दिन, फ़रिश्तों, किताब और नबियों पर ईमान लाया और माल, उसके प्रति प्रेम के बावजूद,
नातेदारों, अनाथों, मुहताजों, मुसाफ़िरों और माँगनेवालों को दिया, और गर्दनें छुडाने
में भी, और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी, और अपने वचन को ऐसे ही लोग पूरा करनेवाले
हैं जब वचन दे, और तंगी और विशेष रूप से शारीरिक कष्टों में, और लड़ाई के समय में
जमनेवाले हैं, ऐसे ही लोग हैं जो सच्चे सिद्ध हुए और यही लोग डर रखनेवाले हैं ।</strong><small>
(अल-बक़रा, 177)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>वे तुमसे पूछते हैं, कितना ख़र्च करें। कहो, (पहले यह
समझलो कि) जो माल भी तुमने ख़र्च किया है, वह तो माँ-बाप, नातेदारों और अनाथों
और मुहताजों और मुसाफ़िरों के लिए ख़र्च हुवा है। और जो भलाई भी तुम करो, निस्संदेह
अल्लाह उसे भली-भाँति जान लेगा ।</strong><small> (अल-बक़रा, 215)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और जो लोग ईमान लाये और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के
मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन
है। उनके लिए क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका है। और जो लोग बाद में ईमान लाए
और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम ही में
से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब में ख़ून के रिशतेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार
हैं। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है। </strong><small>(अल-अनफ़ाल, 74-75)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>अल्लाह की बन्दगी करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ,
और अच्छा व्यवहार करो माँ-बाप के साथ, नातेदारों, अनाथों और मुहताजों के साथ, नातेदार
पड़ोसियों के साथ और अपरिचित पड़ोसियों के साथ और साथ रहनेवाले व्यक्ति के साथ
और मुसाफ़िर के साथ और उनके साथ भी जो तुम्हारे क़ब्ज़े! में हों। अल्लाह ऐसे व्यक्ति
को पसन्द नही करता जो इतराता और डींगे मारता हो।</strong><small> (अल-निसा, 36)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>निश्चय ही अल्लाह न्याय को और भलाई का और नातेदारों को
(उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई और सरकशी से रोकता है। वह
तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो। </strong><small>(अल-नहल 90)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>तुम्हारे रब ने फ़ैसला करदिया है कि उसके सिवा किसी की
बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों
ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँचजायें तो उन्हें “उँह” तक न कहो और न उन्हें
झिड़को, बल्कि उनसे शिष्टतापूर्वक बात करो। और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ
बिछाये रखो और कहो, मेरे रब। जिस प्रकार उन्होंने बचपन में मुझे पाला है, तू भी
उनपर दया कर। जो कुछ तुम्हारे जी में है उसे तुम्हारा रब भली-भाँति जानता है। यदि
तुम सुयोग्य और अच्छे हुवे तो निश्चय वह भी ऐसे रुजू करनेवालों के लिए बडा क्षमाशील
है। और नातेदार को उसका हक़ दो और मुहताज और मुसाफ़िर को भी – और फ़ुजूल ख़र्चें
न करो। निश्चय ही फ़ुज़ूल खर्चें करनेवाले शैतानों के भाई है, और शैतान अपने रब
का बडा ही कृतघ्न है। किन्तु यदि तुम्हें अपने रब की दयालुता की खोज में, जिसकी
तुम आशा रखते हो, उनसे कतराना भी पडे तो इस दिशा में तुम उनसे नर्म बात करो।
</strong><small>(बनी इसराईल, 23-28)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>अतः नातेदार को उसका हक़ दो और मुहताज और मुसाफ़िर को
भी। यह अच्छा है उनके लिए जो अल्लाह की प्रसन्नता के इच्छुक हों, और वही सफल है।
</strong><small>(अल-रूम, 38)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>ऐ लोगों। अपने रब का डर रखो, जिसने तुमको एक जीव से पैदा
किया और उसी जाति का उसके लिए जोड़ा पैदा किया और दोनों से बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ
फैला दी। अल्लाह का डर रखो, जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे के सामने अपनी माँगें
रखते हो। और नाते-रिश्तों का भी तुम्हें ख़याल रखना है। निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी
निगरानी कर रहा है। </strong><small>(अल-निसा, 1)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>यदि तुम उलटे फिर गये तो क्या इससे निकट हो कि धरती में
बिगाड़ पैदा करो और अपने नातों-रिश्तों को काट डालो। </strong><small>(मुहम्मद,
22)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>भला वह व्यक्ति जो जानता है कि जो कुछ तुमपर उतरा है तुम्हारे
रब की ओर से सत्य है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अन्धा है। परन्तु समझते तो वही
हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं, जो अल्लाह के साथ की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करते
हैं और अहद (अभिवचन) को तोड़ते नही, और जो ऐसे हैं कि अल्लाह ने जिसे जोडने का
आदेश दिया है उसे जोड़ते हैं और अपने रब से डरते रहते हैं और बुरे हिसाब का उन्हें
डर लगा रहता है। और जिन लोगों ने अपने रब की प्रसन्नता की चाह में धैर्य से काम
लिया और नमाज़ क़ायम की और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से खुले और छिपे खर्च
किया और भले चरित्र के द्वारा दुराचार को दूर करते हैं, वही लोग हैं जिनके लिये
आख़िरत के घर का अच्छा परिणाम है, अर्थात, सदैव रहने के बाग़ हैं जिनमें वे प्रवेश
करेंगे और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नियों और उनकी संतानों में से जो नेक होंगे
वे भी और हर दरवाज़े से फ़रिशते उनके पास पहुँचेंगे। (वे कहेंगे) तुमपर सलाम है
उसके बदले में जो तुमने धैर्य से काम लिया। अतः क्या ही अच्छा परिणाम है आख़िरत
के घर का। रहे वे लोग जो अल्लाह की प्रतिज्ञा को उसे दृढ़ करने के बाद तोड़ डालते
हैं और अल्लाह ने जिसे जोड़ने का आदेश दिया है उसे काटते हैं और धरती में बिगाड़
पैदा करते हैं। वही हैं जिनके लिये फिटकार है और जिनके लिये आख़िरत का बुरा घर
है। </strong><small>(अल-रअद, 19-25)</small></p>
<p>इस्लाम में नैतिकता का साथी, मित्र, पडोसी और नातेदार से ही केवल संबंध नही
है। बल्कि इससे भी आगे शत्रुओं के साथ, चाहे वह विरोधी हो, नैतिकता पर आधारित व्यवहार
करने का आदेश है। इस प्रकार से नैतिक व्यवहार सारी मानवता में व्यापक है। ईशवर
ने कहा। <strong>न अच्छे आचरण परस्पर समान होते हैं और न बुरे आचरण। तुम (बुरे
आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि
वही व्यक्ति, तुम्हारे और जिसके बीच वैर पडा हुवा था, जैसे वह कोई धनिष्ट मित्र
है ।</strong><small> (हा-मीम, अस-सजदा, 34)</small></p>
<p>ईशवर ने मित्र तो मित्र, शत्रु से भी अन्याय न करने का आदेश दिया। ईशवर ने कहा।
<strong>और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज्यादती
न करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नही करता। </strong>
<small>(अल-बक़रा, 190)</small></p>
<p>विरोधियों के साथ युद्ध करने और ईशवर के मार्ग में लगातार प्रयास करने के लिए
निकलने वाली अपनी सेना को ईशवर के रसूल के यह आदेश देखिये। आप ने कहाः धोखा मत
दो। विश्वासघात मत करो। युद्ध में सैनिक के आँख, कान, नाक मत काटो। बच्चों की हत्या
न करो। और प्रार्थना गृह के साधुओं को न मारो। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन
किया) इस धर्म का मामला बडा आश्चर्यजनक है, जो विरोधी, शत्रु, योद्धा के प्रति
भी अच्छे व्यवहार करने का आदेश दे रहा है। जहाँ तक साधारण मनुष्य की बात है, चाहे
वह शत्रु ही क्यों न हो, तो इसके प्रति ईशवर ने भलाई करने और न्याय से काम लेने
का आदेश दिया। ईशवर ने कहा। <strong>अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार
करने और उनके साथ न्याय करने से नही रोकता जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध
नही किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह को न्याय
करनेवाले प्रिय है। </strong><small>(अल-मुम्तहिना, 8)</small></p>
<p>पशु-पक्षियों के साथ अच्छा व्यवहार ।</p>
<div class="shahed">
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<h4>थामस आर्नाल्ड</h4>
<h5>ब्रिटीष प्रचयेविधी विचारक</h5>
<h6>सारे ईमानवाले भाई-भाई है</h6>
<span>इस्लाम में सारे ईमान वालों के भाई-भाई होने का अनोखा नमूना इस धर्म के सिद्धांत
की ओर लोगों को उत्साहिक करने का एक कारण है।</span></div>
<p>इस्लाम ने नैतिकता की परिभाषा को अधिकतर फैलाये रखा। यहाँ तक कि वह पशु-पक्षियों
के साथ भी अच्छा व्यवहार करने को शामिल है। ईशवर के रसूल ने कहाः एक स्त्री को
उस बिल्ली के कारण दण्ड दिया गया, जिसको उसने मृत्यु तक बन्दी बना रखा। किन्तु
वह स्त्री नरक में डाली गयी, क्योंकि उसने बिल्ली को जब अपने पास बंदी बना रखा,
तो उसको न खिलाया, न पिलाया, और न उसको कीटाणु खाने के लिए छोडा। (इस हदीस को इमाम
बुख़ारी ने वर्णन किया) बल्कि ईशवर ने हर चीज़ यहाँ तक कि जानवर को ज़बह करने के
समय भी अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है। रसूल कहते हैः निस्संदेह ईशवर ने हर
चीज़ के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया। जब तुम युद्ध में किसी की हत्या
करो तो अच्छे से करो। जब तुम जानवर ज़बह करो, तो अच्छे से करो। हर एक को चाहिये
कि वह अपनी चाकू पहले तेज़ करलें और अपने जानवर को सुख पहुँचाये। (इस हदीस को इमाम
मुस्लिम ने वर्णन किया)</p>
<p>प्रकृति के साथ अच्छा व्यवहार ।</p>
<p>इसी प्रकार इस्लाम प्रकृति और साधारण दृष्टि के साथ भी अच्छा व्यवहार करने का
सन्देश लेकर आया। इस्लाम ने फ़ुज़ूल खर्चें न करने का आदेश दिया है। फिर प्राकृतिक
संसाधन को बिगाड़ने और उसको नष्ट देने से रोका। ईशवर ने कहा। <strong>खाओ और पियो
अल्लाह का दिया और धरती में बिगाड़ फैलाते न फिरो। </strong><small>(अल-बक़रा,
60)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और उन हद से गुज़र जानेवालों की आज्ञा का पालन न करो जो
धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं, और सुधार का काम नही करते। </strong><small>(अल-शुअरा,
151, 152)</small></p>
<p>इसी प्रकार इस्लाम ने अन्य प्राकृतिक संसाधन, जैसे जल वग़ैरह चीज़ों का बडा
ध्यान रखा है। ईशवर ने कहा। <strong>क्या उन लोगों ने, जिन्होंने इनकार किया, देखा
नही कि ये आकाश और धरती बन्द थे। फिर हमने उन्हें खोल दिया। और हमने पानी से हर
जीवित चीज़ बनाई, तो क्या वे मानते नही? </strong><small>(अल-अंबिया, 30)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और अल्लाह ही ने आकाश से पानी बरसाया । फिर उसके द्वारा
धरती को उसके मृत हो जाने के बाद जीवित किया। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए
बडी निशानी है जो सुनते हैं। </strong><small>(अल-नहल, 65)</small></p>
<div class="shahed">
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<h4>प्रिन्स चार्लस</h4>
<h5>ब्रिटीष राजकुमार</h5>
<h6>इस्लाम और सभ्यता</h6>
<span>ख़ुरआन में मानव और प्रकृति के बीच कोई अंतर नही है। इस्लामिक संसार मानवता
के लिये उपयोकता ज्ञान और तत्वदर्शता की भरमार पूँजी रखता है।</span></div>
<p>पवित्र ख़ुरआन के साथ साथ रसूल की वाणी ने भी अपनी भूमिका निभाते हुवे प्रकृति
और उसके संसाधन कि सुरक्षा करने पर प्रोत्साहित किया। रसूल की वाणी में प्रकृति
को सुरक्षित रखने के प्रति कई आदेश दिये गये हैं। फिर प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव
से रोक-थाम करने का भी आदेश दिया गया। जैसे सूखा और रोग वग़ैरह से। इस बारे में
ईशवर के रसूल कहते हैः तीन बुरी चीज़ों से बचो, नहरों, आम सडक, और छायावाले स्थान
में शौच करने से बचो। (इस हदीस को इमाम अबू दाऊद ने वर्णन किया) आप ने कहा जो भी
मुस्लिम मनुष्य कोई बीज बोता है या पौधा लगाता है, फिर उससे कोई पक्षी, मनुष्य
या जानवर खा लेता है, तो उसकी ओर से यह भी दान होगा। (इस हदीस को इमाम मुस्लिम
ने वर्णन किया।) आप ने कहाः अगर क़ियामत आ जाये, और तुम में से किसी के हाथ में
पौधा हो, तो अगर वह उसको बो सकता है, तो ज़रूर बो लें (इस हदीस को इमाम अहमद ने
वर्णन किया) एक बार ईशवर के रसूल अपने साथी साद के पास से गुज़रे, जबकि वह वज़ू
कर रहे थे। आप ने उनसे कहाः यह क्या फ़ुजूलखर्चें है। तो उन्होंने कहाः क्या वज़ू
में भी फ़ुज़ूल खर्चें हो सकती है। आप ने कहाः हाँ । चाहे तुम नहर के किनारे ही
क्यों न हो। (इस हदीस को इब्ने माजा ने वर्णन किया) रसूल के साथियों ने प्रकृति
के साथ, यहाँ तक कि युद्ध के समय, और शत्रुओं के साथ अच्छा व्यवहार किया। अबू बकर
ने अपने सेना के कर्नल को यह आदेश दियाः बालक, स्त्री और कमज़ोर बूढ़े कि हत्या
न करो। फलदार पेड़ को न काटो। किसी बकरी या गाय को न ज़ुबह करो। हाँ खाने के लिए
अगर हो तो और बात है। किसी आबाद स्थान को बरबाद न करो, किसी खजूर के पेड़ को न
जलाओ और न काटो। (इस हदीस को इमाम मालिक ने वर्णन किया)</p>
<h3 id='5'>नैतिकता पर आधारित कुछ सलाह</h3>
<p>हमारे लिए इस जगह ख़ुरआन और रसूल की वाणी में उपस्थित नैतिकता के कुछ आदेशों
की समीक्षा करना अच्छा है। इनमें से कुछ निम्न लिखे जा रहे हैं।</p>
<p>पवित्र ख़ुरआन में उपस्थित आदेश।</p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतों को उनके हक़दारों
तक पहुँचा दिया करो। और जब लोगों के बीच फैसला करो तो न्यायपूर्वक फ़ैसला करो।
अल्लाह तुम्हें कितनी अच्छी नसीहत करता है। निस्संदेह, अल्लाह सब कुछ सुनता, देखता
है। </strong><small>(अल-निसा, 58)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>कह दो, आओ, मैं तुम्हें सुनाऊँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हारे
ऊपर क्या पाबन्दियाँ लगाई है – यह कि किसी चीज़ को उसका साझीदार न ठहराओ और माँ-बाप
के साथ सदव्यवहार करो और निर्धनता के कारण अपनी संतान की हत्या न करो, हम तुम्हें
भी रोज़ी देते हैं और उन्हें भी। और अश्लील बातों में लिप्त न हों, चाहे वे खुली
हुई हों या छिपी हुई हों। और किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय टहराया है, हत्या
न करो। और यह बात है कि हक़ के लिए ऐसा करना पडे। ये बातें हैं जिनकी ताकीद उसने
तुम्हें की है, शायद कि तुम बुद्धि से काम लो। और अनाथ के धन को हाथ न लगाओ, किन्तु
ऐसे तरीक़े से जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवा वस्था को पहुँच जाए। और इन्साफ
के साथ पूरा-पूरा नापो और तोलो। हम किसी व्यक्ति पर उसी काम की जिम्मेदारी का बोझ
डालते हैं जो उसकी सामर्थ्य में हो। और जब बात कहो तो न्याय की कहो, चाहे मामला
अपने नातेदार ही का क्यों न हो, और अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करो। ये बातें
हैं जिनकी उसने तुम्हें ताकीद की है। आशा है तुम ध्यान रखोगे। और यह कि यही मेरा
सीधा मार्ग है, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हें उसके
मार्ग से हटाकर इधर-उधर करदेंगे। यह वह बात है जिसकी उसने तुम्हें ताकीद की है
ताकि तुम (पथभ्रष्टता से) बचो। </strong><small>(अल-अनआम, 151-153)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और धरती में उसके सुधार के बाद बिगाड न पैदा करो। भय और
आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है।</strong><small>
(अल-आराफ, 56)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और धैर्य से काम लो, इसलिए कि अल्लाह सुकर्मियों का बदला
अकारथ नही करता।</strong><small> (हूद 115)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और अपना हाथ न तो अपनी गरदन से बाँधे रखो और न उसे बिल्कुल
खुला छोड़ दो कि निन्दित और असहाय होकर बैठ जाओ। तुम्हारा रब जिसको चाहता है प्रचुर
और फैली हुई रोज़ी प्रदान करता है और इसी प्रकार नपी-तुली भी। निस्संदेह वह अपने
बन्दों की खबर और उनपर नज़र रखता है। और निर्धनता के भय से अपनी संतान की हत्या
न करो, हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हे भी। वास्तव में उनकी हत्या बहुत ही
बड़ा अपराध है। और व्यभिचार में लिप्त न हो। वह एक अश्लील कर्म और बुरा मार्ग है।
किसी जीव की हत्या न करो जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है
कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो उसके
उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु
वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जायेगी।
और अनाथ के माल को हाथ मत लगाओ सिवाय उत्तम रीति के, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था
को पहुँच जाए, और प्रतिज्ञा पूरी करो। प्रतिज्ञा के विषय में अवश्य पूछा जायेगा।
और जब नापकर दो तो नाप पूरी रखो। और ठीक तराज़ू से तोलो, यही उत्तम और परिणाम की
दृष्टि से भी अधिक अच्छा है। और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो।
निस्संदेह कान और आँख और दिल, इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जायेगा। और धरती
में अकड़कर न चलो, न तो तुम धरती को फाड सकते हो और न लम्बे होकर पहाड़ों को पहुँच
सकते हो। इनमें से प्रत्येक की बुराई तुम्हारे रब की दृष्टि में अप्रिय ही है।
ये तत्वदर्शिता की वे बातें हैं जिनकी प्रकाशना तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर की
है। और देखो, अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न गढना, अन्याथा जहन्नम में
डाल दिये जाओगे निन्दित, ठुकराये हुवे। </strong><small>(बनी इसरईल, 29-39)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>और अपने रब की क्षमा और उस जन्नत की ओर बढो जिसका विस्तार
आकाशों और धरती जैसा है। वह उन लोगों के लिये तैयार है जो डर रखते है। वे लोग जो
ख़ुशहाली और तंगी प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते हैं और क्रोध को रोकते हैं
और लोगों को क्षमा करते हैं। और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय हैं, जो अच्छे-से-अच्छा
कर्म करते हैं।</strong><small> (अले-इमरान, 133-134)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>ऐ लोगों जो ईमान लाये हो। न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे
पुरुष की हँसी उडाये, संभव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ स्त्रियों की हँसी
उडायें, संभव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक-दूसरे
को बुरी उपाधियों से पुकारो। ईमान के बाद अवज्ञाकारी का नाम जुड़ना बहुत ही बुरा
है। और जो व्यक्ति इस नीति से न रुके, तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं। ऐ ईमान लानेवालों।
बहुत-से गुमानों से बचो, क्योंकि कुछ गुमान गुनाह होते हैं। और न टोह में पड़ो
और न तुममें से कोई किसी कि पीठ पीछे निन्दा करे- क्या तुममें से कोई इसको पसन्द
करेगा कि वह अपने मरे हुवे भाई का माँस खाये? वह तो तुम्हें अप्रिय होगा ही। और
अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। ऐ
लोगों। हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिराद्रियों
और क़बीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ
तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है जो तुममें सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही
अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है। </strong><small>(अल-हुजुरात, 11-13)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>ऐ मेरे बेटे। नमाज़ का आयोजन कर और भलाई का हुक्म दे और
बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुझपर पडे उसपर धैर्य से काम ले। निस्संदेह ये बातें
उन कामों में से है जो अनिवार्य और दृढ़ संकल्प के काम हैं। और लोगों से अपना रुख़
न फेर और न धरती में इतराकर चल। निश्चय ही अल्लाह किसी अहंकारी, डींग मारनेवाले
को पसन्द नही करता। और अपनी चाल में सहजता एवं संतुलन बनाये रख और अपनी आवाज़ धीमी
रख। निस्संदेह आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ होती है।</strong><small>
(लुक़मान, 17-19)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>रहमान (करुणामय प्रभु) के (प्रिय) बन्दे हैं जो धरती पर
नम्रतापूर्वक चलते हैं और जब जाहिल उनके मुँह आयें तो कह देते हैं, तुमको सलाम।
</strong><small>(अल-फ़ुरक़ान, 63)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>अल्लाह की बन्दगी करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ,
और अच्छा व्यवहार करो माँ-बाप के साथ, नातेदारों, अनाथों और मुहताजों के साथ और
मुसाफ़िर के साथ और उनके साथ भी जो तुम्हारे क़ब्ज़े में हो। अल्लाह ऐसे व्यक्ति
को पसंद नही करता जो इतराता और डींग मारता हो।</strong><small> (अल-निसा, 36)</small></p>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>(तुमने तो अपनी दयालुता से उन्हें क्षमा कर दिया) तो अल्लाह
की ओर से ही बडी दयालुता है जिसके कारण तुम उनके लिये नर्म रहे हो, यदि कहीं तुम
स्वभाव के क्रूर और कठोर ह्रदय होते तो ये सब तुम्हारे पास से छँट जाते। अतः उन्हें
क्षमा करदो और उनके लिये क्षमा की प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर
लिया करो। फिर जब तुम्हारे संकल्प किसी सम्मती पर सुदृढ़ हो जायें तो अल्लाह पर
भरोसा करो। </strong><small>(अले-इमरान, 159)</small></p>
<p>रसूल की वाणी में उपस्थित नैतिक आदेश।</p>
<p>जब हम रसूल की वाणी कि ओर देखते हैं, तो हम उसमें कई ऐसे विश्वास (ईमान) के
पेड़ देखते हैं, जिससे हम नैतिकता और उच्च चरित्र के नियम प्राप्त कर सकते हैं।
इनमें से कुछ उदाहरण निम्न लिखित है। </p>
<p>ईशवर के रसूल ने कहा लोगों के साथ नर्मी करनेवाले, सरलता के साथ रहनेवाले, आसानियाँ
पैदा करनेवाले और लोगों से निकट रहने वाले पर नरक की आग हराम (वर्जित) है। (इस
हदीस को इमाम तिर्मिज़ी ने वर्णन किया।) </p>
<p>ईशवर के रसूल ने अपने एक साथी से यह कहा कि आपके भीतर दो ऐसी आदतें है, जिसके
कारण ईशवर आपको चाहता हैः </p>
<p>आप शांत स्वभाव रखते हैं,</p>
<p>आप स्वावलंभी है (केवल स्वयं पर आधारित होनेवाला व्यक्ति) (इस हदीस को इमाम
अहमद ने वर्णन किया।) </p>
<p>रसूल ने यह भी कहाः मेरे पास जो भी भलाई होगी, मै उसको तुमसे छुपाकर नही रखूँगा।
जो मनुष्य स्वयं शुद्ध रहना चाहे, ईशवर उसको शुद्धता प्रदान करता है। जो मनुष्य
स्वयं सांसारिक जीवन की सामाग्री को महत्व नही देता है, ईशवर उसको धनी बना देता
है। जो मनुष्य स्वयं धैर्य से काम लेना चाहे, तो ईशवर उसको धैर्य से रहने की क्षमता
प्रदान करता है। और किसी भी व्यक्ति को धैर्य से अधिकतर भली और व्यापक चीज़ प्राप्त
नही हुई है। (इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने वर्णन किया।) </p>
<p>रसूल ने कहाः धनी होने का मतलब सामाग्री की अधिकता नही है। परन्तु धनी वह है
जिसका मन धनी हो (यानी मन में सांसारिक सामाग्री का अधिकतर प्रभाव न हो) (इस हदीस
को इमाम बुख़ारी ने वर्णन किया।) </p>
<p>- रसूल ने कहाः बलवान वह नही है जो मल्ल युद्ध (कुश्ती) करता हो। बल्कि बलवान
वह है जो क्रोध के समय स्वयं पर नियंत्रण रखता हो। (इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने
वर्णन किया। </p>
<p>रसूल ने कहाः ईशवर उस मनुष्य को अपनी अनुग्रह प्रदान नही करता है, जो लोगों
का आभारी न हो। (इस हदीस को इमाम अहमद ने वर्णन किया) </p>
<p>रसूल ने कहाः निस्संदेह ईशवर ने मेरी ओर यह प्रकाशना की है कि तुम आपस में एक
दुसरे के साथ विनम्र बने रहो। कोई किसी के साथ अन्याय न करें। (इर हदीस को इमाम
इब्ने माज़ा ने वर्णन किया।) </p>
<p>रसूल ने कहाः हर भलाई दान है। भलाई में यह भी है कि तुम अपने किसी भाई से मुस्कुराते
हुवे मिलो, और यह भी भलाई है कि तुम अपने ढोल का पानी अपने किसी भाई के ढोल में
डाल दो। (इस हदीस को इमाम तिर्मिज़ी ने वर्णन किया) </p>
<p>अंत मे हम यह देखते हैं कि वास्तविक प्रसन्नता और नैतिकता के बीच घनिष्ठ और
दृढ़ संबंध है। नैतिकता मानवता की प्रसन्नता का एक ही मार्ग है। इसके बिना प्रसन्नता
की उपलब्धि कभी नही हो सकती। मानव अपने जीवन में नैतिकता के बिना असफलता, अप्रसन्नता,
दुख और नष्ट से पीडित रहेगा। इसीलिए प्रसन्नता मानव के लिये उच्च चरित्र अपनाने
का महत्वपूर्ण कारण है। क्योंकि मानव यह अच्छी तरह जानता है कि उच्च चरित्र के
बिना वह एक दिन के लिये, बल्कि एक पल के लिये भी वास्तविक प्रसन्नता से सफल नही
हो सकता है।</p>
  - प्रसन्नता के प्रति होने वाले वाद-विवाद से संबंधित विषय
  - उपन्यास से संबंधित विषय
  - पुस्तकों से संबंधित विषय
  - विडियो से संबंधित विषय
मानवता को मुक्ती दिलाने वाला