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सम्मानजनिक मार्ग

सम्मानजनिक मार्ग

<h2>सम्मानजनिक मार्ग</h2>
<h3 id='1'>मानव को मिलने वाला देवत्व सम्मान</h3>
<p>जब ईशवर ने मानव कि सृष्टी की, तो मानव को आदम के सामने झुकने का आदेश दिया।<strong>
हमने तुम्हें पैदा करने का निश्चय किया, फिर तुम्हें रूप देने का इरादा किया (और
तुम्हारे आदि पिता आदम को पैदा किया) फिर हमने फ़रिशतों से कहा, आदम को सजदा करो।
तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इब्लीस के वह (इब्लीस) सजदा करनेवालों में से ना
हुआ। </strong><small>(अल-आराफ़, 11)</small></p>
<p>ईशवर ने मानव कि सृष्टी की, उसको सम्मान दिया और सारे जीव के मुक़ाब्ले में
उसको सर्वश्रेष्ट बनाया। ईशवर ने कहा। <strong>हमने आदम की संतान को श्रेष्ठता
प्रदान की और उन्हें थल और जल में सवारी दी और अच्छी पाक चीज़ों से उन्हें रोज़ी
दी और पैदा किये हुए बहुत-से प्राणियों की अपेक्षा उन्हें श्रेष्ठता प्रदान की।</strong><small>
(बनी इस्राईल, 70)</small></p>
<p>मानव प्रारंभ ही से सर्वश्रेष्ट और सम्मान जनिक प्राणी है। ईशवर ने उसको निमन
लिखित चीज़ों से सम्मान दिया है। </p>
<p>संरचना का सम्मान। ईशवर ने कहा। <strong>निस्संदेह हमने मनुष्य को सर्वोत्तम
संरचना के साथ पैदा किया। </strong><small>(अल-तीन, 4)</small></p>
<p>ईशवर ने मानव को सर्वोत्तम संरचना के साथ पैदा किया। इस प्रकार कि शरीर और उसके
अंगों में समरूपता रखी। बुद्धी और सोंच की क्षमता दी। बोलने और सुनने कि शक्ती
दी, और उसको सर्वश्रेष्ट रूप में पैदा किया। </p>
<p>मानव के लिये भूमी और समुद्र को काम में लगाने का सम्मान, हवा भी मानव कि सेवा
के लिए बनायी गयी। यह बात भी ऊपरी लिखित सम्मान कि पुष्टी करती है। क्योंकि ईशवर
ने इन सारी चीज़ों को मानव कि सेवा के लिये बनाया है, और सारे जीव में उसको सर्वश्रेष्ट
रखा है। जो इस बात का प्रमाण है कि संसार में मानव का स्थान राजा या मुख्य के समान
है। मानव के अतिरिक्त हर चीज़ उसकी प्रजा और सेवक। ईशवर ने कहा।<strong> हमने आदम
की संतान को श्रेष्ठता प्रदान की और उन्हें थल और जल में सवारी दी। </strong>
<small>(बनी इस्राईल, 70)</small></p>
<p>बल्कि ईशवर ने सूचना दी कि आकाश और धरती में स्थिर हर चीज़ मानव की सेवा में
लगा दी गयी। <strong>जो चीज़ें आकाशों मे है और जो धरती मे है, उसने उन सबको अपनी
ओर से तुम्हारे काम मे लगा रखा है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिये निशानियाँ
हैं जो सोंच-विचार से काम लेते हैं। </strong><small>(अल-जासीया, 13)</small></p>
<p>पवित्र रोज़ी-रोटीः ईशवर ने मानव को आदेश दिया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जो
चाहे खायें (इन भोजनों के लिये लाभ दायक संकेत रखें। ईशवर ने सारे प्रणीयों के
अतिरिक्त मानव के लिये सबसे अधिक भोजन कि सामाग्री रखी है। क्योंकि सारे प्राणी
(मानव के अतिरिक्त) वही भोजन खाते हैं जिसके वे रुची रखते हैं। इसी प्रकार ईशवर
ने अपनी कृपा और दया से मानव के लिए सारे प्राणी सेवा में लगा दिया। <strong>वही
है जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को फर्श और आकाश को छत बनाया, और आकाश से पानी उतारा,
फिर उसके द्वारा हर प्रकार की पैदावार और फल तुम्हारी रोज़ी के लिये पैदा किया,
अतः जब तुम जानते हो तो अल्लाह के समक्ष ना टहराओ।</strong><small> (अल-बख़रा,
22)</small></p>
<p>ईशवर के बनाये हुए सारे जीव पर मानव कि सर्वश्रेष्ठताः मानव देवत्व समानता के
कारण इस मार्ग में स्वयं के लिये सम्मान, महान्ता और स्थान पाता है। परन्तु मानव
इस भौतिक संसार में साधारण छोटा सा कण नही रहा। जो भौतिक मापदण्ड कि दृष्टी से
एक मामूली कण है। इस मापदण्ड कि दृष्टी से यह धरती भी साधारण कण है, जिसको दो लाख
प्रणीयों का एक परामाणु बम विनाश करदेता है। जैसा कि हिरोषिमा में हुआ। इस्लाम
कि दृष्टी से मानव का महत्व ईशवर द्वारा उसके लिये विशेष की गयी समान्ता से प्रकट
होता है। जब हम ख़ुरआन में आदम के सामने सर झुकाने, फिर शैतान को ईशवर द्वारा स्वर्ग
से बाहर निकाले जाने से संभन्धित वाणी देखते हैं। जिस में शैतान ने आदम के सामने
झुकने से इन्कार किया। हम यह समझ सकते हैं कि मानवीय विख्यात व्यक्तित्व की स्थापना
करने में यह स्थंभ किस हद तक महत्व है। उस समय जबकि मानवता इच्छाओं कि शक्ती के
वार कि गतिरोध से निकल नही पारही थी। उसके सामने केवल एक ही मार्ग था। वह ख़रआन
का मार्ग है, जो मानव को स्वतंत्रता, सम्मान और उसके अनेक विकल्प प्रदान करता है।
सम्मान के मार्ग में किसी मानव का अपमान करना, या उसको नीच समझना या उसका मज़ाक
उडाना सही नही है। ईशवर ने कहा। <strong>ऐ लोगों जो ईमान लाये हो। न पुरुषों का
कोई गिरोह दूसरे पुरुष की हँसी उडायें, संभव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ
स्त्रिओं की हँसी उडायें, संभव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और
न आपस में एक-दूसरे को बुरी उपाधियों से पुकारो। ईमान के बाद अवज्ञाकारी का नाम
जुड़ना बहुत ही बुरा है। और जो व्यक्ति इस नीति से रुके, तो ऐसे ही लोग ज़ालिम
हैं। </strong><small>(अल-हुजुरात, 11)</small></p>
<p>गोरे को काले पर, लाल को पीले पर, अरबवालों को उनके अतिरिक्त लोगों पर, एक जात
को दूसरी जात पर, एक शहर को दूसरे शहर पर सम्मान्ता के प्रति कोई विशेषता प्राप्त
नही है। मगर उसको जो ईशवर का डर रखता है। ईशवर ने कहा। <strong>ऐ लोगों। हमने तुम्हें
एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिराद्रियों और क़बीलों का रूप
दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक
प्रतिष्ठित वह है जो तुममें सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जाननेवाला,
ख़बर रखनेवाला है। </strong><small>(अल-हुजुरत, 13)</small></p>
<h3 id='2'>मानव के सम्मान का मापक</h3>
<p>रसूल ने कहाः निस्संदेह ईशवर तुम्हारे रूप और धन को नही देखता, लेकिन तुम्हारी
नियतों और कर्मों को देखता है। (इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने वर्णन किया।) इसी कारण
मानव को इस मार्ग पर चलने और उसके अनुसरण करने के समान सम्मान और प्रभुत्व प्राप्त
होता है। <strong>जो कोई प्रभुत्व चाहता हो तो प्रभुत्व तो सारा का सारा अल्लाह
के लिये है। </strong><small>(फ़ातिर, 10)</small></p>
<p>ईशवर का अनुपालन करते हुए सारे जिस मार्ग पर इकट्ठा चलते हैं, इस मार्ग से दूरी
के अनुसार मानव को अपमान मिलता है। ईशवर ने कहा। <strong>क्या तुमने देखा नही कि
अल्लाह ही को सजदा करते हैं वे सब जो आकाशों में हैं और जो धरती में हैं, और सूर्य,
चन्द्रमॉ, तारे, पहाड़, वृक्ष, जानवर और बहुतसे मनुष्य। और बहुत-से ऐसे हैं जिनपर
यातना का औचित्य सिद्ध हो चुका है, और जिसे अल्लाह अपमानित करे उसे सम्मानित करनेवाला
कोई नही। निस्संदेह अल्लाह जो चाहे करता है। </strong><small>(अल-हज, 18)</small></p>
<p>हालांकि ईशवर ने मानवता को सम्मान दिया है, फिर भी अधिकतर लोगों ने अपमान का
मार्ग चुन रखा है। <strong>और जिसे अल्लाह अपमानित करे उसे सम्मानित करनेवाला कोई
नही।</strong><small> (अल-हज, 18)</small></p>
<p>वे मानव को साधारण जीव, या बेज़बान सामाग्री या वित्तीय आंक्ड़े, या इसके अतिरिक्त
अन्य दृष्टी से देखते हैं, जो ईशवर द्वारा अपनी दया और कृपा से मानव को मिले हुए
सम्मान के विरुद्ध है। </p>
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<h4>बिरेशा बेनकामर्ट</h4>
<h5>थाईलाँड का शिक्षक (जो बुधमत छोड कर इस्लाम ले आया)</h5>
<h6>कोई भूका नही रहेगा</h6>
<span>इस्लाम के समान मेरी दृष्टी में कोई दूसरा ऐसा धर्म नही है, जिसने ज़कात
को एक संपूर्ण धार्मिक नियम बनाया है। ज़कात निकालने का उत्साह रखने वाला इस्लामिक
समूह ग़रीबी और बिगाड़ से पवित्र होता है। मेरा विचार यह है कि अगर सारा संसार
इस्लाम कि ओर मार्गदर्शन प्राप्त करले, तो धर्ति पर कोई भूका या ग़रीब नही रहेगा
।</span></div>
<p>मानव को सम्मान्ता उसके मानव होने के कारण ही है। इस्लाम दो लिंगों के बीच अंतर
नही रखता। यह सम्मान्ता पुरुष को स्त्री के विरुद्ध या स्त्री को पुरुष के विरुद्ध
प्रदान नही किया है। क्योंकि सारे लोग एक ही जीव से पैदा किये गये हैं। ईशवर ने
कहा। <strong>ऐ लोगों। अपने रब का डर रखो, जिसने तुमको एक जीव से पैदा किया और
उसी जाति का उसके लिये जोड़ा पैदा किया, और दोनों से बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ
फैला दी। अल्लाह का डर रखो, जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे के सामने अपनी माँगें
रखते हो। और नाते-रिश्तों का भी तुम्हें ख़याल रखना है। निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी
निगरानी कर रहा है। </strong><small>(अल-निसा, 1)</small></p>
<p>जो मनुष्य प्रभुत्व और सम्मान्ता कि इच्छा रखता है, उसको सम्मान्ता और प्रभुत्व
का मार्ग चलना चाहिए। ईशवर ने कहा। <strong>सारा प्रभुत्व अल्लाह ही के लिए है।
</strong><small>(यूनुस, 65)</small></p>