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सच्चे धर्म के नियम

सच्चे धर्म के नियम

सच्चे धर्म के नियम

प्रत्येक व्यक्ति अपने सिद्धांत को कैसे सही समझता है ?

सदैव हर धार्मिक अपने धर्म ही को सब से ज्यादा सही होने, और दूसरे धर्मां के ग़लत होने का दृंढ़ विश्वास रखता है। और हर धार्मिक अपने धर्म की सफाई करने मे दूसरों से अलग होता है। परन्तु विक़ृत या भ्रष्ट धर्मवाले यह दावा करते है कि उन्होने अपने वंशजो को इसी के अनुसार पाया है और वे उन्ही का अनुसरण कर रहे है। और इसी तरह हम ने तुम से पहले किसी बस्ती में कोई हिदायत करने वाला नहीं भेजा, मगर वहाँ के खुशहाल लोगों ने कहा कि हम ने अपने बाप-दादा को एक राह पर पाया है और हम कदम-ब-क़दम उन ही के पीछे चलते है। पैग़म्बर ने कहा, अगरचे मै तुम्हारे पास ऐसा (दीन) लाऊं कि जिस (रास्ते) पर तुम ने अपने बाप-दादा को पाया, वह उससे कही सीधा रास्ता दिखता हो, कहने लगे कि जो (दीन) तुम दे कर भेजे गये हो, हम उस को नही मानते। (अल जुख्रूफ 23- 24)

और ईश्वर ने कहा और जब उन लोगों से कहा जाता है कि जो (किताब) खुदा ने नाज़िल फरमायी है, उसकी पैरवी करेंगे जिस पर हमने बाप-दादा को पाया। भला अगरचे उनके बाप-दादा न कुछ समझते हो और न सीधे रास्ते पर हों (तब भी वे उन्ही की पैरवी-किए जाएंगे) जो लोग कफ़िर हैं. उनकी मिसाल उस शख्स की है जो किसी किसी ऐसी चीज़ को आवाज़ दे जो पुकार और आवाज़ के सिवा कुछ सुन न सके। (ये) बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे है कि (कुछ) समझ ही नही सकते।(अल ब्ख्रा, 170- 171)

और यह लोग अपनी स्थिति को बिना सोंच विचार या बुध्दिमत्ता के केवल अंधी परंपरा पर आधारित होते हैं, या ग़लत, झूठी और विरोधाभासी बातों पर आधारित होते है जिनके सच्चे होने का न कोई समर्थन होता है और न कोई सबूत। निश्चित रुप से धर्म और सिध्दांत के बारे में इस जैसी बातों पर आधारित होना और इनको सबूत बनाना सही नही होता है।

क्या सारे धार्मिक सिद्धांत सत्य है ?

और इसलिए कि सही बात एक से अधिक नही हो सकती, परन्तु यह असंभव है कि यह सब धर्म सही हो, और यह भी असंभव है कि यह सब धर्म एक ही समय में सच्चे हो, वरना सच विरोधभासी हो जायेगा, और इस प्रकार के विचार को श्रेष्ठ बुध्दि स्वीकार नही करती है। अगर यह खुदा के सिवा किसी और का (कलाम) होता, तो उसमें (बहुत-सा) इख्तिलाफ़ पाते। (अल निसा, 82)

तो फिर सच्चा धर्म क्या है? और वह कौन से नियम है जिसके अनुसार हम इन सिध्दंतों में से किसी एक के सच होने का (जिसमें यह नियम उपलब्ध हो) और इसके अलावा दूसरे सिध्दांतों के ग़लत होने का निर्णय लें?

देवत्व स्त्रोत रखने वाला धर्म

यह कि उस धर्म का स्त्रोत देवत्व हो, यानी ईश्वर की ओर से हो, इस प्रकार से कि इस धर्म को ईश्वर ने भक्तों तक पहुँचाने के लिए अपने किसी एंजिल्स के व्दारा रसूलों पर सराय हो। इसलिए कि सच्चा धर्म वह इस ब्रह्माण्ड के प्रजापति ईश्वर का धर्म है, और ईश्वर ही वह पवित्र महात्मा है जो सारे जीव से अपनी ओर से भेजे हुए धर्म के बारे में भविष्य जीवन में प्रश्न करेगा, ईश्वर ने कहा (ऐ मुहम्मद!) हम ने तुम्हारी तरफ़ उसी तरह वह्य भेजी है, जिस तरह नूह और उन से पिछले पैग़म्बरों की तरफ़ भेजी थी और इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक़ और याकूब और याकूब की औलाद और ईसा और अय्यूब और यूनुस और हारुन और सुलेमान की तरफ़ भी हम ने वह्य भेजी थी और दाऊद को हम ने ज़बूर भी इनायत की थी। और बहुत से पैग़म्बर हैं, जिनके हालत हम तुम से पहले बयान कर चुके है, और बहुत से पैग़म्बर हैं जिनके हालत तुमसे बयान नही किये। और मूसा से तो खुदा ने बातें भी की। (सब) पैग़म्बरों को (खुदाने) खुशख़बरी सुनाने वाले और डराने वाले (बना कर भेजा था), ताकि पैग़म्बरों के आने के बाद लोगों को खुदा पर इल्ज़ाम का मौक़ा न रहे और खुदा ग़ालिब हिक्मत वाला है। (अल निसा, 163 - 165)

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मिखाईल हेम्झ

ब्रिटिश लेखक
एकता (एक ईश्वर को मानना)
इसलाम में बुनियादी सत्य एकता है। अल्लाह एक है और मुहम्मद (स) अल्लाह के रसूल है। शिर्क को एक ओर रखदिया गया है। इस कारण (अल्लाह को) ना बाप है न बेटा और न पवित्र व संसारिक में अंतर है। न पूर्वी और पश्चिमी के दर्मियान भेद है। यहाँ तो केवल एक दुनिया और एक दीन है।

इस फल स्वरुप से जो भी धर्म कोई व्यक्ति लाये और उसको अपने ही ओर श्रेय करे, न कि ईश्वर की ओर, तो निश्चित रुप से वह धर्म ग़लत होगा, और जो धर्म भी मानव सृजन करे, उसको बढावा दे, और उसको अच्छा समझे, ज़रुर वह धर्म भी गलत होगा, क्यों कि मानवता की भलाई बुध्दिमान प्रजापति ईश्वर से अधिक वह व्यक्ति जान नही सकता जो केवल धार्मिकता में परिवर्तन लाये या विकास करे। भला जिस ने पैदा किया, वह बे-खबर है? वह तो छिपी बातों का जानने वाला और (हर चीज़ से) आगाह है। (अल मुल्क, 14)

वरना तो विकास लानेवाला या परिवर्तन करने वाला ही वह प्रभु और ईश्वर होगा जो मानवता की भलाई का अधिक ज्ञान रखता है (ईश्वर इन बातों से बहुत ही परेह है) क्या ये (काफ़िर) खुदा के दीन के सिवा किसी और दीन के तालिब हैं, हालाकि सब आसमानों और ज़मीन वाले, खुशी या ज़बरदस्ती से खुदा के फ़रमाबरदार हैं और उसी की तरफ़ लौट कर जाने वाले है। (आल इम्रान, 83)

ईश्वर ने कहा तुम्हारे फरवरदिगार की क़सम! ये लोग जब तक अपने झगड़ों में तुम्हे मुनसिफ़ न बनायें और जो फ़ैसला तुम कर दो उस से अपने दिल में तंग न हों। (अल निसा, 65)

एकीकरण सिद्धांत कि ओर बुलाने वाला धर्म

धर्म एक ईश्वर की प्रार्थना करने का आदेश दे, और किसी को उसका बागीदार मानने को पाप समझे। एक ईश्वर को मानना सारे नबी और रसूलों के धर्म का आधार है, ईश्वर का भागीदार समझना और मूर्ति पूजा करना श्रेष्ठ बुध्दि और सामान्य वृत्ति के विरोध है। ईश्वर ने कहा और जो पैग़म्बर हमने तुम से पहले भेजे, उन की तरफ़ यही वह्य भेजी कि मेरे सिवा कोई माबूद नही, तो मेरी ही इबादत करो। (अल अनंबिया, 25)

हर नबी ने अपनी क़ौम से यही कहाखुदा की इबादत करो, उस के सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं। मुझे तुम्हारे बारे में बड़े दिन के अज़ाब का (बहुत ही) डर है। (अल आरफ, 59)

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गास्टोन बारेट

आँक्सफोर्ड यूनिवरसिटी का मानवीय सैध्दांतिक
अल्लाह की प्रकृति
छोटे बच्चों में स्थाई रुप से एक अल्लाह पर ईमान रखने की वैधता पाई जाती है। इसलिए कि बच्चों का यह विचार होता है कि विश्व में सारी चीज़े किसी कारण ही पैदा की गयी हैं। बल्कि जब हम बच्चों को तनहा किसी व्दीप में छोड दें, और वे वहीं शिक्षा प्राप्त करें तो ज़रूर वो अल्लाह पर ईमान ले आयेंगे।

इस आधार से जो भी धर्म ईश्वर के साथ किसी और की भागीदारी को स्वीकार करें या नबी या एंजिल या साधू, सन्त या मानव या पत्थर वग़ैरह को ईश्वर का भागीदार माने वह धर्म ग़लत है, क्यों कि प्रार्थना सिर्फ उस एक ईश्वर के लिए है जिसका कोई भागीदार नही, मूर्ति पूजा और ईश्वर का भागीदार मानना खुली त्रुटि है। और हर वह धर्म (चाहे वह ईश्वर की ओर से क्यों न आया हो) जिसमें ईश्वर की भागीदारी का सिध्दांत हो, वह धर्म ग़लत है। और ईश्वर ने हमारे लिए उसका उदाहरण देते हुए यह कहा। लोगो! एक मिसाल बयान की जाती है, उसे ग़ौर से सुनो कि जिन लोगों को तुम खुदा के सिवा पुकारते हो, वे एक मक्खी भी नहीं बना सकते, अगरचे उसके लिए सब जमा हो जाए और अगर उन से मक्खी कोई चीज़ छीन ली जाए तो उसे उस से छुडा नहीं सकते। तालिब और मत्लूब (यानी आबिद और माबूद दोनों) गये-गुज़रे हैं। इन लोगों ने खुदा की क़द्र जैसी करनी चाहिए थी, नही की, कुछ शक नहीं कि खुदा ज़बरदस्त (और) ग़ालिब है। (अल ह्ज, 73 – 74)

वृत्ति के साथ समानता रखने वाला धर्म

यह है कि धर्म सामान्य वृत्ति के मुनासिब हो। ईश्वर ने कहा तो तुम एक तरफ़ के हो कर दीन (खुदा के रास्ते) पर सीधा मुंह किए चले जाओ (और) खुदा की फ़ितरत को, जिस पर उस ने लोगों को पैदा किया है, (अख्तियार किए रहो) खुदा की बनायी हुई (फ़ितरत) में तब्दीली नहीं हो सकती। यही सीधा दीन है, लेकिन अक्सर लोग नही जानते। (अल रोम, 30)

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आदम स्मित

स्काटलैंड का दार्शनिक
अंधविश्वास का रोग
अंधविश्वास जैसे ज़हर का इलाज शिक्षा ही है।

वृत्ति वह चीज़ है जिस पर प्रजापति ने अपनी प्रजा की सृष्टि की है, और यह वृत्ति प्रजा की स्थापना का एक अंग हो गया है, इसी कारण यह असंभव है कि धर्म मानवता के लिए उपयुक्त न हो, वरना प्रजापति धर्म के नियम बनानेवाला न होता, यह बात असंभव और ईश्वर के साथ भागीदार मानने के समान है।

बुद्धि के साथ समानता रखने वाला धर्म

यह है कि धर्म श्रेष्ट बुध्दि के मुनासिब हो, इसलिए कि सच्चा धर्म ईश्वर का बनाया हुआ नियम है, श्रेष्ठ बुध्दि ईश्वर की बनायी हुयी जीव है, यह असंभव है कि ईश्वर के नियम और उसके जीव के बीच टकराऊ हो। ईश्वर ने कहा क्या उन लोगों ने मुल्क में सैर नहीं की, ताकि उनके दिल ऐसे होते कि उन से समझ सकते और कान (ऐसे) होते कि उन से सुन सकते। बात यह है कि आंख अंधी होती, बल्कि दिल जो सीनों में हैं (वे) अंधे होते हैं।(अल ह्ज, 46)

ईश्वर ने कहा बेशक आसमानों और ज़मीन में ईमान वालों के लिए (खुदा की खुदरत की) निशानियां हैं। और तुम्हारी पैदाइश में भी और जानवरों में भी, जिन को वह फैलाता है, यक़ीन करने वालों के लिए निशानियां हैं। और रात और दिन के आगे-पीछे आने-जाने में और वा जो खुदा ने आसमान से रोज़ी (का ज़रिया) नाज़िल फ़रमाया, फिर इस से ज़मीन को उस के मर जाने के बाद ज़िंदा किया, उस में और हवाओं के बदलने में अक़ल वालों के लिए निशानियां हैं। ये खुदा की आयतें हैं, जो हम तुम को सच्चाई के साथ पढ़ कर सुनाते है, तो यह खुदा और उसकी आयतों के बाद किस बात पर ईमान लाएंगे? (अल जासिया, 6)

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डेविड हयोम

स्काटलैंड का दार्शनिक
अपना प्रमाण प्रस्तुत करो
बुध्दिमान वह है जो प्रमाण पर अपनी ईमान की नीव रखता हैं।

परन्तु यह ग़लत है कि सच्चा धर्म मिथकों, मनोरंजक कहानियाँ या विरोधाबास हो। इस प्रकार से कि हम इस जैसे धर्म कि कुछ बातों और सी धर्म की दूसरी बातों के बीच टकराऊ पाते है, जो श्रेष्ठ बुध्दि के विरोध है, क्योंकि श्रेष्ठ बुध्दि कोई आदेश दे फिर उसी आदेश के विरोध में दूसरा आदेश दे, और इसी प्रकार से एक समूह के लिए किसी काम को अधिकृत करे, और वही काम दूसरे समूह के लिए वंचित करे, या एक ही प्रकार की बातों के बीच अंतर करे, या विरोधभासी बातों को एक साथ ज़ोडते।

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अल्बेर कामो

फ्रेंच दार्शनिक
मनुष्य की पहचान उसके चरित्र है
नैतिकता के बिना मनुष्य एक क्रूर है जिसे इस संसार में खुला छोडदिया गया है।

ईश्वर ने कहा भला ये क़ुरआन में ग़ौर क्यों नहीं करते? अगर यह खुदा के सिव किसी और का (कलाम) होता, तो उसमें (बहुत-सा) इख्तिलाफ़ पाते।(अल निसा, 82)

बल्कि धर्म का स्पष्ट सबूतों पर आधारित होना ज़रुरी है। ईश्वर ने कहा (ऐ पौग्म्बर) कह दो कि अगर सच्चे हो तो दलील पेश करो (अल बखरः, 111)